रविवार, 19 अप्रैल 2015

मंथन

कविता 


खुल कर सांस ले


तू 
जीवन भरपूर जी
उसे उलझाने का 
प्रयास न कर 

मदहोश सपनो के
ताने बाने  बुन
उसमे अटकने की 
कोशिश न कर

बहते वक़्त के साथ 
तू भी अविरल बह 
उसमे डुबकी लगाने 
की कोशिश न कर 

आंतर मे चल रहे 
अंतर्द्वंद को विराम दे 
अकारण स्वयं से लड़ने की
कोशिश न कर 

थोडा तो
परमात्मा पर छोड़ दे
सब कुछ लेने की 
कोशिश न कर 

जो मिल गया 
उसी मे प्रसन्न रह 
जो शान्ति छीन ले 
उसे पाने की कोशिश न कर 

अपने हाथों को फैला 
खुलकर सांस ले 
अन्दर ही अन्दर घुटने की 
कोशिश न कर 

दिनेश सक्सेना









2 टिप्‍पणियां:

  1. दिनेश जी आप अपने हृदय मे श्रृंगार रस की तीव्र भावनाओं को लेकर प्रेम के नये आयामों को दर्शाया है वह वास्तव मे अति उत्तम है ! भाषा पर आपकी पकड़ अच्छे है ! यह एक उत्कृष्ट रचना है जो जीवन के दर्शन को दर्शाती है

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  2. उर्मिला जी आपको रचना पसंद आये उसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद ! भविष्य मे भी प्रयास करता रहूँगा की आपकी आशानुरूप लिख सकूँ !!!!!

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