शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

एहसास

व्यंग्य

इस भ्रष्टाचार को क्या नाम दूँ



रोज रोज चक्कर लगाने से क्या आपका काम हो जायेगा ,क्यों यहाँ आकर रोज सर पर बैठ जाते है ! अभी आपकी फ़ाइल मेरे पास नहीं आयी है जब आयेगी तब आना ! पर एस डी  आई कार्यालय से तो फ़ाइल डेढ़ महा पहले ही आ चुकी है यहाँ ,क्या बात करते हो इसका मतलब मैं  झूट बोल रहा हूँ आपसे ,जाइये जब फ़ाइल आयेगी तब आईयेगा !ठीक है धन्यबाद शर्मा जी मैं बाद मे आता हूँ ! एक सप्ताह बाद मैं फिर कार्यालय पहुंचा और बोला शर्मा ही नमस्कार , अरे भाई ………बैठ जाइये खड़े क्यों है ?शर्माजी बड़ी विनम्रता से बोले ! ठीक है धन्यबाद। ……… वह ऐसा है। ............. मुझे इस बात का डर है कही मैं बैठ गया तो मेरा दिल खड़ा न हो जाये इसलिए शर्माजी ,मुझे खड़ा ही रहने दे और मुझे संक्षेप मे यह बताइये कि क्या किया जाये ?मैंने अपना रंग बदलते हुए कहा !वह बोले आप तो बहुत विद्वान मास्टरजी है। अरे भाई ,बैठिये तो ,मुझे भी तो सेवा का मौक़ा मिले आपकी। पूरे कार्यालय मे तो आप आपको स्कूल मे पड़ने पढ़ाने से छुट्टी मिली नहीं। .......... अब सेवानिवृत हो गए है तो कम से कम अब तो हम आपके सान्निध्य का कुछ लाभ उठा सकें !शर्मा जी ने अपने खुर्राटपन  का प्रदर्शन किया !

मैं बैठ गया ! उन्होंने चपरासी को बुलाकर मेरे लिए पानी लाने  का आदेश दिया और मेरी तरफ मुखातिब होकर बोले आपने इतने दिन शिक्षा विभाग मे काम किया है फिर भी आप इस तरह बचपने की बात करते है यह उम्मीद नहीं थी आपसे ,शर्मा जी ने गिरगिट के तरह अपना रंग बदल कर कहा !मैं भी यही कहने वाला था कि आप लोगों ने मुझे इतने वर्षों मे परखा ही नहीं कि मैंने अपने सेवा काल मे कितनी कुर्बानियां दी है पर कभी अपने सिद्धांतों से समझोता नहीं किया ! मैं गर्व पूर्वक बोला ! शर्मा जी ने तब कहा कि आपने कितना नुक्सान किया है अपना ,कभी आपने अनुमान लगाया है ?लाखों रूपए का। …………… अगर आपने मात्र कुछ हज़ार खर्च कर दिए होते तो आज आपको कितना अधिक धन मिलता !अच्छा आप यह बताइये कि क्या हमने अपने सिद्धांत से समझोता किया है ,कभी हमने इन्क्रीमेंट या ट्रांसफर फ्री किया हो सदा ही इसके बदले कुछ न कुछ लिया ही है ऑफिस की भी आचार संहिता होती है और हम उसी के अनुरूप कार्य करते है !शर्मा जी ने बात साफ़ की ! इसका मतलब फ़ाइल यहाँ यूँही नहीं आयेगी मैंने उखड़ते हुए कहा !

उन्होंने बात को फ़ौरन संभाला ,अरे मान्यवर ,आपके घर से ऑफिस की दूरी मात्र पांच मिनट की है यहाँ तक पहुँचने मे पचास मिनट क्यों लग गए ? मैं  बताता हूँ रास्ते मे जाम मिला होगा और भी अवरोध आये होंगे तभी तो इतना समय लग गया ! शर्मा जी की बात बीच मे अधूरी रह गयी क्योकी उन्हे बुलाने उनके साहब का चपरासी आ गया ! जिस कमरे मे वह गए थे वह कप्यूटर रूम था जिस पर बहार लिखा था ,कृपया जूते बहार उतार कर प्रवेश करे !उसे पड़कर मुझे बुश का जूता प्रकरण याद आ गया और मे सभी राष्ट्र के अध्यक्षों तक जा पहुंचा जिन्होंने  उस चटपटे जायकेदार वयंजन की इच्छा की और वह पूरी हुयी ! अब तो हमारे यहाँ जम्मूकश्मीर और हरयाणा के लिए भी वही जायकेदार वयंजन आयात कराये जा चुके है !फिर ख़याल आया कि यह वयंजन अब पहले जैसे महत्व के नहीं  रहे ,! यदि मैंने शर्मा जी को जूता डिश चखायी, तो ये खुद को उस मुख्यमंत्री के कद का समझने लगेंगे और मेरे जूते का सम्मान घट  जायेगा !

इस खोकली ईमानदारी पर अपनी तो पूरी जिंदगी बर्बाद की ही और मेरे भी कर डाली !कही दो चार बच्चे होते तो आज हम सब भीख मांग रहे होते !मैं सोच ही रहा था कि इतने मे शर्मा जी आ गए और बोले कि रेट दस हज़ार का है निकालो और अपनी पेंशन ले लो अरे कम से कम अपनी बेटी के शादी तो ढंग से कर लो मास्टरजी !शर्मा जी ने साफ़ साफ़ कहाः और यह सुनकर मेरे सरे आक्रोश पर ताला  सा लग गया ! मैंने शर्मा जी से कहा मैं किसी का धर्म भ्रष्ट नहीं करना चाहता सच तो यह है कि मेरी बेटी की शादी तय हो चुकी है !यह पैसा जितनी जल्दी मिल जाता उतनी जल्दी मैं उसकी शादी कर डालता ! अब मैं बेचारगी पर उतर आया था ! पर शर्मा जी टस  से मस  न हुए और बोले मास्टरजी रूपए दस हज़ार दीजिये और अपना काम करवा लीजिये बिना उसके कुछ नहीं हो सकता ! दस हज़ार रूपए लेकर आ जाये और अपना चेक लेकर चले जाये शर्मा जी ने दो टूक लहजे मे कहा !मंजूर है मुझे मैंने कहा !

शर्मा जी फिर मुझे समझाते हुए बोले देखीये मास्टर जी जैसे बिटिया की शादी  मे खुशी खुशी दहेज़ दिया जाता है ,जैसे किसी देवता को खुश  करने के लिए प्रसाद चढ़ाया जाता है वैसे ही प्रजातंत्र के इस मंदिर मे प्रसाद चढ़ाते समय मन गन्दा नहीं करना चाहिए ! आपके द्वारा चढ़ाया गया प्रसाद बी एस ए से लेकर शिक्षा मंत्री ,मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक पहुंचता है !किन्तु यह बात मुर्ख जनता कहाँ समझती है वह तो इसे भ्रष्टाचार कहती है ,पूजा तोड़े ही मानती है इसे !भाई मास्टर जी अब आप इस भ्रष्टाचार को कुछ भी नाम दो पर  इसे भ्रष्टाचार मत कहो !मैंने शर्मा जी के हाथ पर दस हज़ार रूपए दिए और अपना काम करवाकर लौट आया !पर आज भी मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि इस भ्रष्टाचार को क्या नाम दूँ !यही है आज के राजतंत्र का जनतंत्र !

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

एहसास



लेख 

सतर्क रहिये और विचार कर अपनाइये




प्यार दुनियाँ का सबसे आकर्षक और सशक्त शब्द है । प्यार को ज़िंदगी से निकल दीजिये फिर सोचिये ,जिंदगी कैसी होगी ? मैने इस पर बहुत बार लिखने की सोची पर ये मुझे कभी समझ ही नहीं आया , क्यूँकि जब भी इसको समाज के बीच देखा, सुना, जाना, महसूस  किया तो थ्यौरी और प्रक्टिकल में अंतर ही पाया। कहने को तो प्यार इबादद है , ईश्वर का दिया उपहार है , पर असल में धोखा और फरेब क्यूँ है ? पर एक सत्य ये भी हैl कि अगर आप दुनियाँ और स्वार्थ से हट कर इसे महसूस  कीजिये, तो ये बहुत ही सुखद और अपनत्व लिए हुये है। पर वर्तमान का प्यार I love you वाला है ,और इस I love you कि मै क्या व्याख्या करूँ,इसकी विश्वसनीयता मेरी add की हुई पिक में देख लीजिये………… इतना ही लिख पाये थे ,तभी मेरी भतीजी ने आकर कहा, बुआ जी बुक दे दीजिये कोई भी, बाबा जी पढ़ने को माँग रहे है। और उसे बुक देते हुए, 'प्रेम प्रकाश जी' की बुक मेरे हाथ में आ गई, उसका जो पन्ना खुला उसके ऊपर ही लिखा था Remain alert and adopt after deliberation मैने थोड़ा पढ़ा, तो मैंने सोचा कि मेरे प्रेम की व्याख्या में आकर्षण ,भावुकता ईश्वरिये गुण सब हो सकते हैl पर वर्तमान के धरातल पर मेरे प्रेम ने मुझे तकलीफ ही दी, तो हम आपको वो नहीं दे सकते, जो तकलीफ दे और स्वप्निल दुनियाँ में ले जाएl क्यूँकि मैंने हमेशा आपको यथार्थ ही दिया है ,l और फिर हमने अपने प्रेम ग्रंथ को फिर अधूरा ही छोड़ दिया....और जो दे रहें है l वो हमे उमीद है , आप सबको पसंद आयेगा और वर्तमान में जीने में सहायक भी होगा........................

सतर्क रहिये और विचार कर अपनाइये
Remain alert and adopt after deliberation

इस दुनियाँ के प्रति प्रेम और अपनापन का व्यवहार जितना आवश्यक है ;
उतना ही आवश्यक इस संसार से सतर्क रहना भी है। यह वह रंगमंच है ,जहाँ प्रत्येक प्रकार के जानवर  और लोग  तरह-2 के स्वांग भर  कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। इसकी सारी गतिविधियाँ स्वार्थ के वशीभूत ही चलती रहती हैं। न जाने कितने पैगम्बर , कितने ईश दूत , कितने ही प्रभु अवतार यहाँ उत्पन्न हुए हैं ; मानवों को सभ्य बनाने के लिये इन लोगों ने अपने को तिल-तिल जलाकर करूणा, दया, प्रेम, स्नेह का महत्व स्थापित करने की कोशिश की है ; लेकिन वे इस विश्व में इन उदात्त भावों को प्रतिष्ठित कर सकने में असफल रहे। इस मनुष्य की मक्कारी देखिये कि वह इनके स्मारकों, प्रतीकों, मूर्तियों और बुतों का निर्माण करता है। उनके चरणों पर सिर पटकता है, गले में फूलों की माला डालता है, उनके नाम पर हमेशा मार काट मचायें रहता है ; पर अपने हृदय में उनके उदात्त भावों को प्रतिष्ठित नहीं करता। वह अश्रुभरे नेत्रों से इनके सामने हाथ जोड़े अपनी शरण में लेने की प्रार्थन करता रहता है; पर उनके हृदय में व्याप्त शैतान ठहाके लगता रहता है। फर्क केवल इतना है कि इसने पाखण्ड का चोला पहन लिया है; जो और भी खतरनाक है ; क्योंकि सज्जन व्यक्ति इनके धोखे में पड़कर मारा जाता है।
अतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में , प्रत्येक व्यक्ति से सतर्क रहने की जरूरत है। प्रेम, दया, स्नेह, अपनापन, उदारता, करुणा, आदि अच्छे भाव हैं और निश्चय ही इन्हें आपको अपनाना चाहिये; पर यह लकड़बघ्घों और भेड़ियों के लिये नहीं है। ये किसी भी रूप में आपके सामने आ सकते हैं।
चाणक्य ने कहा है - "राह में चलते समय, घर में प्रवेश करते समय, समाज में व्यवहार करते समय, उठते-बैठते एवं भोजन करते समय और सोते समय ; जो सतर्क रहता है; वही बचता है; दूसरा नहीं।" "दार्शनिक प्रेम प्रकाश शर्मा"

मेरी इस पोस्ट का उद्देश्य आपको जागरूग करना है ,खुद के प्रति और दुनियाँ के प्रति भी, तो प्लीज रेनू की रिक्वेस्ट है.. कि सतर्क बनिएगा सनकी नहीं ,की आप आज को जी ही न पाओ l तो एन्जॉय कीजिये अपनी लाइफ को केअरफुली खुश रहिये, सबको खुशियाँ बांटिये हम फिर मिलेंगे..कुछ दिनों बाद....…………… 

.रेनू सिंह  







मंथन



यादें

तन्हाइयों का बिरानियों का अंदाज़ क्या बतायें
हम आज अपने दिल का हाल क्या बतायें
लग रहा है फिर से पास वो आएगें
पर जाने वाले का इंतज़ार क्या बतायें
तन्हाइयों का.............................

लोग बदल जाते है जगह वही रहती है
अंदाज़ बदल जाते है बात वही रहती है
हर लम्हों की याद बनी रहती है
दी हुई उनकी सौगात क्या बताये
तन्हाइयों का..........................
क्यूँ भीड़ मे भी तन्हा हम आज लग रहें है
हम उनसे अपने रिश्तों का नाम क्या बतायें
तन्हाइयों का...........................
उनका मुस्कुराना यूँ पास मेरे आना 
मुझसे सब बताना आज उन पलों की क्या दास्ताँ सुनाये
तन्हाइयों का...................................
हम आज...................................
....रेनू सिंह

मंथन

कविता

विस्तार तुम्हारा 


विस्तार कहाँ तक "तुम " को दूँ
प्रथम "तू "अपने को इंगित करता

ओर अंत "म"मुझको कहता है
"तू" तू ही रहेगा "म "मै ही हूँ

फर्क इतना ही है की पहले "तू"
और पीछे मै हूँ जोड़े की तरह

हम दोनों को, एक ही जोड़े है
उसको कुछ भी नाम दे दो तुम

कुछ भी समझ लो नया  तुम
प्यार ,प्रेम ,मोहब्बत संज्ञा दे दो

सब कुछ देखो और परखो खरा तुम
कसोटी पर कसो और देखो फिर तुम

एक नया रिश्ता ,एक नया बंधन
"तू"और "म " मिला" तुम" बनजा 

दिनेश सक्सेना 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

प्रेम एक सत्य है 

 

प्रतीक्षा मे कोई सीमा नहीं होती 
स्मृति का कोई समय नहीं होता

अनवरत मेरी सांसे जब तक
मैं , मैं ही होता हूँ  तब तक

दूजा न कोई होता पास मेरे 
क्या मांगना तुमसे मिलो तुम

सांसे सांसों से प्राण आत्मा से
ह्रदय ह्रदय से ,प्राण प्राण से

हो एकीकार तुम ,तुम ना रहो
मैं , मैं ना रहूँ ऐसा दे दो मुझको 


अभिराम प्रिये , कल्पना हो साकार प्रिये
तुमको निमंतरण देता हूँ मैं ,तुम से हम होने को

पल का तुम मूल्य समझ लो नव जीवन जीने को
एक निश्चय अब तुम कर लो जीवन तरंग जीने को


दिनेश सक्सेना 






 

 



शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

राजनीति

  हंगामा और तेलंगाना 


संसद के अंदर आपसी कटुता के कारण काली मिर्च स्प्रे का प्रयोग वा सांसदों द्वारा किया गया हंगामा वास्तव मे लोकतंत्र को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश को शर्मसार कर गया ! विदेशों मे भी भारत की छबी को जो  क्षति पहुँची है  उसका वर्णन करना खुद को ही शर्मसार करना होगा !सियासत और सियासतदारों का ऐसा घिनोना खेल शायद ही कभी देश ने देखा होगा ! इस खेल ने 2014 मे सभी मर्यादाओं को ताक पर रख कर तेलंगाना सम्बन्धी विधेयक को आखिरकार मंजूरी मिल जाना इस चुनावी समय मे कांग्रेस अपने लिए बड़ी उपलब्धी मान रही है ! वैसे उसे इससे होने वाले राजनीतिक  नफ़ा नुक्सान का गणित लगाने के वजाय यह देखना अधिक प्रासंगिक होगा कि चिर प्रतीक्षित तेलंगाना को कितना फायदा होगा और सीमांध्र को कितना घाटा होगा !यह भी सोचना होगा कि नए राज्य के गठन से उस इलाके की समस्या हल हो सकेगी अथवा नहीं !केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने तक ही सब कुछ सीमित रह जायेगा !

ऐसा माना जाता है कि उत्तराखंड एवं झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के बाद से राजनीतिक पार्टीओं  को जरूर लाभ पहुंचा है पर वहाँ के लोगों को कुछ हासिल नहीं हो सका है !यही नहीं इसके साथ ही केंद्र मे बनने वाली आगामी सरकार के समक्ष बुंदेलखंड ,पूर्वांचल ,विदर्भ ,बोडोलैंड और गोरखालैंड जैसे राज्यों के मांगों को भी सहने को तैयार रहना होगा ! इस पूरे प्रकरण मे बहुत कुछ  सम्भव है कि पूरे देश मे विरोध का शिकार हो रही कांग्रेस को तेलंगाना मे कुछ सीट अधिक प्राप्त हो जाये किन्तु सीमांध्र मे तो उसके लिए उम्मीद कम लग रही है !एक तो राज्य के कोंग्रेस्सी मुख्य मंत्री पद और पार्टी छोड़ कर विरोध मे खड़े हो गए है ! अनेक और सांसद - विधायक भी विरोध मे उतर आये है ! कांग्रेस से ही अलग हुए जगन मोहन रेड्डी की पार्टी पहले से ही तेलंगाना के खिलाफ वहाँ एक मजबूत आंदोलन चलाये हए है !

यह सब कुछ कांग्रेस के विरोध मे ही जाता दिख रहा है ! क्या इस सब की भरपाई की कोशिश मे प्रधान मंत्री ने सीमांध्र को विशेष पैकेज देने का आश्वासन दिया है पर लगता नहीं कि यह घाव पर मरहम का काम करेगा !अलग तेलंगाना राज्य बन जाने के बाद उसके अपने झगडे भी सीमांध्र के साथ शुरू हो सकते है ! इसमें पानी का सवाल सबसे बड़ा होगा जिसका हल अभी निकट भविष्य मे नजर नहीं आता ! अब तक कांग्रेस ने जितनी बार देश को बांटा है शायद ही किसी अन्य दल ने ऐसा किया हो ! कांग्रेस के कारण देश तो सदा ही विघटित होता रहा है और समस्याओं मे  भी बढ़ोतरी हुयी है ! आखिर देश बांटों और राज करो की नीति कब तक यह देश सहन करता रहेगा !

दिनेश सक्सेना

राजनीति

असमानता पैदा करने वाला आयोग 


आगामी लोकसभा के बिकुल ठीक पहले अपने कार्यकाल के आखिरी वक़्त मे संप्रंग 2 सरकार निरंतर इस कोशिश मे दिखाई दे रही है कि वह अपनी वापसी के लिए किस तरह मतदाताओं को अधिक से अधिक लुभा सके ! विशेष कर मुस्लिम मतदाताओं पर कांग्रेस की नज़र है ! इसी कारण सरकार अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम समुदाय पर महरवानियां बरसाने मे  कोई कसर  नहीं छोड़ना चाहती है ! न्याय मूर्ती राजेंद्र सच्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर अल्पसंख्यकों के लिए सामान अवसर आयोग के गठन की मंजूरी को इसे रूप मे ही लिया है !देश का संविधान तो बिना जाती ,मजहव का भेद किये सभी को सामान अधिकार की और विकास की ही बात करता है ! फिर क्यों इससे हट कर वोट बैंक के लिए समाज को धार्मिक आधार पर बाँटा जा रहा है ?राजनीती का इतना पतन होगा वोट बैंक के लिए यह कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा ! किन्तु वोट की राजनीति नागरिकों को अल्पसंख्यक एवं बहुसंखयक के द्र्ष्टि कोण से देखा जायेगा ऐसे कल्पना भी कभी किसी  सभ्य समाज ने नहीं की होगी ! सरकार क्यों नहीं देखती कि किसी ख़ास समुदाएँ को लाभ पहुचाते समय अन्य समुदायों की अनदेखी ना की जाये ?

सामान अवसर आयोग वास्तव मे नागरिकों की असमानता का भाव पैदा करता है ! पर अल्पसंख्यकों की समस्याओं को ध्यान मे रखते हुए प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने संप्रग 1 शाशन काल के अंदर 2005 मे सच्चर कमेटी का गठन किया था कमेटी की सिफारिशे भी 2006 मे ही आ गयी थी ! तब से सरकार उसे ठन्डे वस्ते मे डाले हुए थी ! परन्तु अब चुनाव के समय उसकी याद अचानक आना कोई अप्रत्याशित नहीं है अपितु यह केवल वोट बैंक के राजनीति का ही हिस्सा मात्र है ! मुस्लिम समुदाय प्रगती की राह पर आगे बड़े इस पर किसी देशवासी को कोई आपत्ति नहीं है पर जिस तरह से कांग्रेस ने चुनाव के समय इस जिन्न को बहार निकाला है वह तरीका आपत्तिजनक जरूर है 

राजनीतिक मर्यादायों के पतन के बाद अब देश की कांग्रेस पार्टी से और क्या उम्मीद की जा सकती है ! राजनीतिक मर्यादाओं को सबसे ज्यादा तहस नहस कांग्रेस ने ही किया है क्योंकि देश मै सबसे अधिक शाशन उसी ने किया है ! देश के नागरिकों के हर वर्ग की तरक्की हो इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है आपत्ति इस बात पर है कि राजनीतिक मूल्यों मे जो गिराबट आयी है उससे समाज आपस मे  ही बट गया है ! मुस्लिम तुष्टीकरण जाती वाद के नाम पर कब तक कांग्रेस देश पर राज्य करेगी यह भी देश की जनता को सोचना होगा यदि देश को विघटन से बचाना है तो देश के मतदाताओं को इस विषय पर गंभीता पूर्वक विचार करना होगा अन्यथा यह देश आंतरिक दंगे फसादों मे ही फंसा रहेगा !

दिनेश सक्सेना

मंथन

कविता 

तेरी याद आती है 


बरसों से तेरी याद आती रही
आँखे यूँही सदा  बरसती रही

रुक नहीं पाते अब आँसूं कभी
रात रात भर बस यूँ रोती रही

अपने को तो समझा ही लेती
याद आते ही गहरी सांसे लेती

फिर याद आते है वही पुराने कल
हंसते खिखिलाते वही सुन्दर पल

कभी तुमसे मेरी नज़रे हटती नहीं
ज्यादा खुशी थी कोई गम था नहीं

तेरी मुस्कराहट भी मेरी हंसी थी
तेरे गम भी मेरी ही उदासियाँ थी

आज मेरा दोस्त मुझसे रूठ गया
मनाना चाहती थी पर  चला गया

बतियाना चहाती हूँ पर बतयाती नहीं
मेरी हर सुबहा हर रात उससे होती थी

दिनेश सक्सेना 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

छटपटाहट 


हम याद मे तुम्हारी  छटपटाते रहे
तुम फ़िज़ाओं मे मस्ती लुटाती रही

सदियां गुजरती रही  ऑंसू थम न सके  
आओगी एक दिन यही ख़याल आते रहे

रही होंगी तुम्हारी भी कुछ  मजबूरियां
सोच कर यादें तुम्हारी  हम भुलाते रहे

हम से ही बेबफाई   तुम्हे रास यूँ आ गयी
कलंक हमारे नाम ओ वफ़ा यूँही लगाती  रही 

हम राह तुम्हारी देखते रहे रात और दिन
झूठी तुम तसल्ली बस यूँही दिलाती रही

दिनेश सक्सेना

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता

मैंने प्यार किया था 


भूल नहीं पाया कि तुम्हे प्यार किया था
तुमने भीकहाँ निभाने से इंकार किया था 

हर राह मे क्यों तुम्हे मुश्किल दिखी
मैंने हमेशा तुम पर एतवार किया था

हम पुकारते रहे तुम ही ना सुन सकी
मैंने कब साथ चलने से इंकार किया था

दिल है मानता नहीं इसको लाख मनाया
कहता है क्यूँ प्यार का इकरार किया था

कारण है इसका ये  गिला भी तुम्हारा है 
इस प्यारनेमेरे दिल को बीमार किया था

दिनेश सक्सेना

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता

एक लड़की पागल सी 


एक लड़की पगली सी ना जाने क्यों
मुझे देख यूँ ही मुस्कराती रहती है 

जब भी मै उसको बुलाता जाने वह
इतना इठलाती ओर मुस्कुराती क्यों

 उसकी याद मुझे अक्सर सताती है
या मेरी याद उसे अक्सर सताती है

मुझे प्यार है तुमसे जब मै  कहता
वह कहती मुझको फिर पागल क्यों

जब कभी मै ख्यालों मे खो  जाता
पास मेरे आकार मुझे हँसाती क्यों

जब मै केशों से  उसके खेला करता
कुछ देर के लिए वह रूठ जाती क्यों

मोहब्बत हुयी है  समझी जब वह
मुझे खुदा वह बताने लगी  क्यों

छोड़ कर ना जाना कभी तुम मुझे
ना जाने मिन्नत करने लगी क्यों

जीने मरने की कसमे खाती थी
फिर इठला कर भाग जाती क्यों

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

पत्र तुम्हारे 


प्रणय जैसे भाव
पिपासु होंठ से -अक्षर
वह तुम्हारे पत्र

गुजरते बीते पलों की
सतरंगी यादों का
सप्तस्वर जादू

या सुगम एहसास के
अतिरेक की कुछ गुनगुनाती
जार्जट की साड़ी  सी पीली धूप 
उसमे महकती खुशबु

बस गए
बेकरार दिल के गांव मे
पैजनिया बंधे कुछ पांव मे
किस अधिकार से कभी कभी
तुम्हारे पत्र

प्रणय जैसे भाव
पिपासु होंठ -से अक्षर
वह तुम्हारे पत्र 


दिनेश सक्सेना

राजनीति

बजट , उम्मीद और कोशिश 


वित्त मंत्री से चाहे लोगों को कितनी उमीदें रही हो किन्तु  उन्होंने अंतरिम बजट के माघ्यम से अपनी सरकार और पार्टी की बहुत सारी उम्मीदों को पूरा करने की भरसक कोशिश की है ! देश की आबादी मे  60 % युवा है !चुनावी साल मे बजट पेश करते वक़्त वित्त मंत्री ने इसका ख्याल बहुत ख़ूबसूरती से रखा कि युवा को कैसे लुभाया जाये !एजुकेशन लोन मे ब्याज की राहत ,कंज्यूमेबल ड्यूरेबल व बाइक /कार पर एक्साइज ड्यूटी का कम करना ,सेना के जवानो को एक पद एक पेंशन का प्रावधान किया जाना जैसे कदम पूरे तरह से चुनाव को ध्यान मे रखते हुए किया गया एक कदम मात्र है !

फ़ोन और गाड़ियों की कीमत मे कमी कर वित्त मंत्री ने  मध्य आये वर्ग की बड़ी आबादी को भी लुभाने की कोशिश की है !इनकम टैक्स के स्लैब मे कोई परिवर्तन नहीं करना जबकी वोट ऑन एकाउंट पेश करने की मजबूरी कहा जा सकता है ,क्योंकी चुनाव के बाद आने वाली नई  सरकार जब अपना कार्य भार  सम्हालेगी तो पूरे साल के लिए बजट पेश करते समय इसका ध्यान रखा जा सकता है !वित्त मंत्री ने ऐसा बजट पेश कर आने वाली  सरकार के सामने एक चुनौती छोड़ दी है !देश के कर सुधारों के हिसाब से महत्वपूर्ण माने जाने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स  (जी एस टी )और डायरेक्ट टैक्स कोड (डी टी सी )लागू नहीं करना वित्त मंत्री की सबसे बड़ी चूक है जो केवल आने वाली सरकारों के लिए एक बम साबित होंगी ! उन्होंने यह इसे ना लागू किये जाने का ठीकरा भी विपक्ष के सिर फोड़ दिया !

ऑटो मोबाइल उद्योग एक लम्बे अर्से से एक्साइज ड्यूटी मे  राहत देने की मांग कर रहा था !इसकी मदद से सप्लाई चेन तथा कॉम्पोनेन्ट निर्माता को राहत देने की मांग की जा रही थी !चुनावी साल मे वित्त मंत्री ने इसे भी पूरा कर दिया और मदद पहुँचाने की कोशिश भी की !कृषि क़र्ज़ के लिए बड़ा प्रावधान कर और समय पर लोन चुकाने वाले किसानो को ब्याज मे राहत की घोषणा की जिससे किसान खुश होकर कांग्रेस को अपना वोट दे सके !किसानो के लिए ब्याज दर मे माफी और समय पर ब्याज चुकाने वाले किसानो को अतिरिक्त छूट की  घोषणा कर के समाज के एक बड़े वर्ग को लुभाने की मात्र कोशिश भर ही  कही जा सकती है चुनाव को देखते हुये !

पिछले सालों  मे शिक्षा क़र्ज़ लेकर पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या मे काफी बढ़ोत्तरी हुयी है !एजुकेशन लेने वाले छात्रों का  ब्याज माफ़ कर वित्त  मंत्री ने कम से कम 9 लाख छात्रों के रहत देने का प्रयास भर किया है जिससे सरकार की लोकप्रियया युवाओं मे बड़े ! चुनावी साल मे वित्त मंत्री ने मध्य वर्ग आय ,युवाओं और किसानो के साथ ही सेना के जवानो को लुभाने के लिए जो खेल खेला है वह निश्चित रूप से आने वाली सरकार के लिए कष्टकारी सिद्ध होगा ! हाँ इतना जरूर है कि वित्त मंत्री के उम्मीदे कुछ कुलांचे मारती प्रतीत हो रही है !

कुल मिलकर यह बजट केवल चुनावी बजट करार दिया जा सकता है ,इस बजट मे राहुल गांधी को केंद्र मे रखकर घोषणाय की गयी है ! इसमें केवल सरकार , पार्टी और राहुलगांधी को लाभ पहुँचाने का मात्र प्रावधान है अन्य कुछ नहीं ! पर अब बहुत देर हो चुकी है ,इस बजट से सरकार और पार्टी को कितना लाभ मिलेगा यह तो वक़्त ही बतायेगा ! कुल मिलकर बजट 2014 निराश करने वाला ही है ! यह स्व प्रशंसा का बृहद प्रयास  के अतिरिक्त कुछ नहीं है !यह  पूरी तरह दिशाहीन बजट  है !

दिनेश सक्सेना

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

उम्र का चढ़ाव 


उम्र दराज होने पर हमें कुछ यूँ  इशारा हो गया
हम  राह इस जिंदगी का ओर प्यारा हो गया 

क्या हुआ जो चेहरे पर पड़ने लगी यूँ  सिलवटे
कदम दर कदम पर साथ उनका गवारा हो गया 

जुल्फ व रुखसार से बडके भी जहाँ कोई हुस्न है
दिल हंसी उनका है ये हमको नज़ारा हो गया 

खो गयी अब जवानी डगमगाते से अब पग है
एक दूजे का अब मगर  हमको सहारा हो गया 

है खुदा से गुजारिश की साथ उनका ही मिले
यदि रंगीन दुनिया मे फिर आना हमारा हो गया

दिनेश सक्सेना

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

एहसास

काहानी

ताऊजी 


सेवा निवृती के बाद अपने ही जन्म स्थान पर जाकर बसने का मेरा पुराना सपना था !जहाँ पैदा हुआ ,खेला ,पड़ा और बड़ा हुआ वह जगहा कितनी ही यादों को आज भी मेरे अंदर ज्यों की त्यों ज़िंदा रखे थी ! स्नातकोतर पूरा होने के बाद जो अपना शहर छूटा तो फिर मुड़ कर पीछे देखने का समय ही नहीं मिला ! नौकरी करने आया था और यहाँ आकर काम मे उलझता ही चला गया ! नौकरी ,शादी ,बच्चे जिम्मेदारी बढ़ती ही जा रही  थी और सीमित आय मे ही सभी जम्मेदारी पूर्ण करनी पड़   रही थी !इन्ही सब कामों मे मैं उलझता ही जा रहा था !पता ही नहीं चला की कब बच्चे बड़े हो गए और मेरी सेवा  निवृति का समय भी करीब आ रहा था !

होते होते सेवा निवृति के लिए केवल एक वर्ष शेष रह गया था ,बच्चों का विवहा कर उनको अपने अपने स्थानो पर भेज कर मैं ने गम्भीरता से इस विषय़ पर विचार किया !लम्बी छुटटी ले कर अपने शहर ,अपने रिश्तेदारों के साथ थोड़ा थोड़ा समय बिता कर यह सर्वेक्षण करना चाहा कि रहने के लिए कौन सी जगह उपयुक्त रहेगी !घर बनवाना पड़ेगा या बनाबनाया ही कही खरीद लेंगे !मुझे याद है पिछली बार जब मैं आया था तब सुरेश चाचा के साथ छोटे भाई की अनबन चल रही थी !मैंने उन दोनों मे समझोता करवा कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली थी !छोटी बुआ और बड़ी बुआ भी रूखा और ठंडा सा व्यवहार कर रही थी !मुझे जाने क्यों चाचा भतीजे का मनमुटाव अच्छा नहीं लगा !

इस बार भी कुछ ऐसा ही लगा तो पत्नी ने समझाया ,"जहाँ चार बर्तन होंगे तो वोह खड़केंगे ही !मैं तो हर बार देखती हूँ !जब भी घर जाओ किसी न किसी से ! किसी ना किसी का तनाव चल रहा होता है !4 साल पहले भी सुरेश चाचा के परवार मे अबोला चल रहा था !" "लेकिन हम  तो उनसे मिलने गए न, तुम चाची के लिए साड़ी भी लाई थी " ""तब छोटी का मुँह सूज गया था !मैंने बताया तो था आपको !साफ़ साफ़ तो नहीं मगर इतना इशारा आपके भाई ने भी किया था की जो उसका रिश्तेदार है वोह चाचा से नहीं मिल सकता !"" ""अच्छा ?मतलब मेरा अपना व्यवहार ,मेरी  अपनी बुद्धि गए भाड़ मे जिसे छोटा पसंद नहीं करेगा उसे मुझे भी छोड़ना पडेगा "" ""और इस बार छोटे का परिवार सुरेश चाचा के साथ तो घी शक्कर जैसा है !लेकिन बड़ी बुआ के साथ नाराज़ चल रहा है !""

"वह क्यों ?" ""आप खुद ही देख सुन लीजिये न !मैं अपने मुँह से कुछ कहना नहीं चाहती !कुछ कहो तो आप कहेंगे नमक मिर्च लगा कर सुना  रही हूँ !"" पत्नी का तुनकना भी सही था !वास्तव मे आँखे बंद करके मैं किसी भी औरत की बात पर विशवास नहीं करता ! वह चाहे  मेरी माँ ही क्यों न हो ! अक्सर औरतें ही हर फसाद और कलेश का  बीज रोपती है !10 भाई  सालों तक साथ रह सकते है पर उनके बीच एक लुगाई आयी नहीं कि अलग अलग  कर दिए जाते है ! पूरी नौकरी के समय लगभग 100 -200 परिवारों की  कहानी तो बड़ी नजदीक से देखी सुनी ही है !हर घर मे वही सब ,वही अधिकार का रोना और कर्तव्यों को भूलना !वही महिलाओं को अपने परिवार को लेकर असुरक्षित रहना !पारवारिक कलह अधिकतर औरतों के कारण ही होती है !

मेरी पत्नी शुभा  यह सब जानती है !इसलिए कभी कोई राय नहीं देती !मेरे यहाँ घर बना कर सदा रहने के लिए भी तैयार नहीं है ! इसलिए वह चाहती है कि मैं लम्बे समय तक यहाँ टिक कर और निरीक्षण करूँ  क्योंकी दूर के ढोल सुहावने होते है  या वास्तव मे यहाँ प्रेम की नदी बहती है ! कभी कभी कोई यहाँ आया तो आपने उसकी आवभगत कर ली इससे यह तो स्पष्ट नहीं होता के उनका यह चरित्र है ! अल्प समय मे भला किसी का मन कैसे टटोला जा सकता है !हमारे खानदान के एक ताउजी है जिनसे हमारा सामना सदा इसी तरह होता रहा है मानो सिर पर उनकी  छत न होती तो हम अनाथ ही होते !सारे  काम छोड़छाड़ कर हम उनके चरणस्पर्श करने दौड़ते है !सबसे बड़े है !इसलिए छोटी मोटी  सलाह भी उनसे की जाती है !उम्रदराज है इसलिये उनकी जान पहचान का लाभ भी अक्सर हमें मिलता है !राजनीति मे भी उनका अच्छा रसूख है जिस कारण हमारे सारे  रुके काम हो  जाते है और हम लोग भी  ताऊजी   ताऊजी कर उनकी तरफ ही दौड़ जाते है !

हमें अच्छा खासा सहारा था उनका ,बड़े बुजुर्ग बैठे हो तो सिर  को एक आसमान जैसी अनुभूती होते है ! वही आसमान है हमारे ताऊजी !मैं  ताऊजी के लिए एक शाल लाया था उपहार स्वरुप !शुभा से कहा कि वह शाम को तैयार रहे उनके घर जाना है !छोटा भाई मुझे यूँ देखने लगा ,मानो उसके कानो मे गरम सीसा दाल दिया हो किसी ने ! शायद इस बार उनसे भी अनबन हो गयी हो , क्योकि हर बार किसी ना किसी से उसका झगड़ा होता ही रहता है !""आपका दिमाग तो ठीक है न भाईसाहब !आप ताऊ के घर शॉल लेकर जायेंगे ?बेहतर है मुझे गोली मार कर मुझ पर इस का कफ़न दाल दीजिये !"" स्तब्ध तो रहना ही था मुझे !यह क्या कह रहा है ,छोटे इस तरह क्यों? ""बाहर रहते है न आप ,आप नहीं जानते यहाँ घर पर क्या क्या होता है !मैं पागल नहीं हूँ जो सबसे लड़ता फिरता हूँ !मुकदमा चल रहा है चाचा का और मेरा ताऊ के साथ और दोनों बुआ उनका साथ दे रही है !सब कुछ है ताऊ के पास !15 -20  दुकाने है ,बाजार मे 4 कोठियां है ,ट्रांसपोर्ट कंपनी है ,एक शो रूम है !औलाद एक ही है और कितना चाहिये इंसान को जीने के लिए ?"" "" तो यह बात है लेकिन उनके पास जो है  वह उनका अपना है ,इसमें हमें कोई जलन नहीं होनी चाहिए ""!

""पर हमारा जो है वह तो हमारे पास रहने दे !कोई सरकारी कागज है ताऊ के पास !उसी के बल पर उन्होंने हम पर और चाचा पर मुकदमा ठोंक रखा है कि हम दोनों का  घर हमारा नहीं है ,उनका है !नीचे से लेकर ऊपर तक हर जगह ताऊ का ही तो दरवार है !हर वकील उनका दोस्त है और हर जज ,हर कलक्टर उनका यार है !मैं कहाँ जाऊ रोने ?बच्चा रोता हुआ बाप के पास जाता है पर यहाँ तो बाप सामान ताऊ ने ही मेरा गला काट दिया ,ताऊ की भूंख इतनी बढ़   चुकी है कि ……………""  उसके मुँह से यह सब सुनकर ,आसमान से नीचे गिरा मैं ,मानो मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व ही पारा पारा हो  होकर बिखर गया ! शॉल हाथ से छूट कर गिर पडी ,कानो को विश्वास नहीं हुआ ,सोचने लगा क्या कभी मैं ऐसा कर  पाउँगा छोटे के बच्चों के साथ ? अपने छोटे भाई के दर्द को मैं कभी समझ ही नहीं पाया ,मैं भी इस घटनाक्रम मे  बराबर का दोषी हूँ ,मुझे उसके परेशानी जाननी चाहिये थी !  फिर भी मैंने छोटे को समझाया और ताउजी के यहाँ जाने का निर्णय कर लिया ,इस सारे घटनाक्रम का पटाक्षेप करने के लिए !शुभा  से बोला की तैयार हो जाओ ,शॉल लेकर मैं और शुभा शाम को ताउजी के यहाँ चल दिए जैसे सदा जाते थे वही इज़ज़त और मानसम्मान ले कर !उनके घर पहुंचा तो स्तब्ध रह गया उनका व्यवहार देख कर !

क्यों ? भाई की वकालत करने आये हो ,तो मत करना वह घर और विजय का घर मेरे पिता ने खरीदा था ! तो क्या हुआ आपके पिता  हमारे बाप के भी तो पिता थे ! यह कैसे हो सकता है कि  बाप ने किसी बेटे को इतना दिया और किसी बेटे को कुछ नहीं इसका कैसे पता चले ?"" तो जाओ तहसील मे जाओ पता करो कागज निकलवाओ " ""तहसीलदार से हम क्या पता करे आप ही बता दीजिये आप तो बड़े है इस घर के"" !मैंने तो बता दिया की यह सब मेरा है !माफ़ कीजियेगा ताउजी  मैं आपके सामने अपनी जुवान खोल रहा हूँ !क्या हमारे पिताजी इतने नालायक थे जो दादा जी ने उन्हे कुछ न देकर सब कुछ आप को ही दे दिया ! और सुरेश चाचा को भी कुछ नहीं दिया !"" मेरे सामने जुवान खोलना तुम्हे भी आ गया अपने भाई के तरह !"" "" मैं गूंगा हूँ आपसे किसने कह दिया ताउजी ? इज्जत और सम्मान करना जानता हूँ तो क्या बात करना नहीं आता होगा मुझे !ताउजी ,आपका एक ही बच्चा है और आप भी कोई अमृत का घूँट पी कर नहीं आये है !यहाँ की अदालतों मे आपकी चलती है !मैं जानता हूँ मगर प्रकृति के भी अपनी एक अदालत है जहाँ न किसी की चली है और न किसी की चलेगी ,वहाँ अन्याय किसी के साथ नहीं होता !आप क्यों अपने बच्चे के लिए लम्बी चौड़ी बाद दुआओं के फेरिस्त तैयार कर रहे है ?हमारे सिर से यदि आप छत छीन लेंगे तो क्या हमारा मन आपका भला चाहेगा ?"" दिमाग मत चाटो मेरा जाओ जो बन पड़े कर लो"" "",हम कुछ नहीं कर सकते आप जानते है ,तभी मैं समझाने  आया हूँ ताउजी "" 

85 साल के वृद्ध की आँखों मे पैसे की इतनी भूख फिल्मों मे तो देखी  थी पर घर मे नहीं ! स्वार्थ का नंगा तांडव आज पहली बार अपने जीवन मे देखा था !उस रात मैं बहुत रोया !छोटे और सुरेश चाचा की लड़ाई मे मैं भावनात्मक रूप से उनके साथ हूँ मगर उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि मैं इस देश का केवल एक आम आदमी हूँ जिसे दो वक़्त की रोटी कमाना ही आसान नहीं ,वह गुंडागर्दी और बदमाशी का सामना कैसे करेगा !बस इतना ही कह सकता हूँ कि भगवान् ताउजी जैसे  लोगों को सद्बुद्धी दे और हम जैसो के सहनशीलता तथा सब्र ! इतना सोचकर मैं पुनः वापिस जाने की तैयारी करने लगा !……………………

दिनेश सक्सेना

राजनीति

भारत बनाम नेताओं का समूह


जनता बनाम भेड़ो का समूह जिनसे प्रोफिट बहुत है जिसमे लाठी थामने और चारा खिलाने  की क़ाबिलियत हो हाँक ले जाओ l

राजनीत बिना उद्देश्य और लक्ष्य के चलती हुई गाड़ी ,जिसका इस्तेमाल नेता कर रहे है...अपने शौक शक्ति और पैसा कमाने के लिए l

नेता बनाम उधोयोगपतियों के अदृश्य  गुलाम

मीडिया सभी गठजोड़ और संस्कारों को सम्पन कराने वाला  विद्वान...जिसने जितना  दिया उसके लिए उतने ही जादा मंत्र उच्चारण करेगा l

कुल मिला कर भारत का प्रजातंत्र...महाभारत का चक्रव्यूह जिसमे मृत्यु हमेशा अभिमन्यु बनाम सत्य की होती रहेंगी l

क्यूँकि..भारतियों की शारीरिक एवं वैचारिक   स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 से , आज तक मानसिक गुलामी से आजाद नही हो पाये......……………………आखिर क्यों ???????

.रेनू सिंह 

मंथन

कविता 

ज़ाम 


बना दिया जाम जब तुमने अपने हाथों से
प्रिये बोलों मैं इंकार करूँ भी तो कैसे
वैसे तो मै कब से जन्दगी से उब चूका
मेरा जीवन दुखों के सागर मे डूब चुका
पर प्रियतम आज सिरहाने  तुम आ बैठी
तो सोच रहा हूँ हाय प्राण त्यागूँ भी कैसे
लक्ष्य अंजाना पथ की भी पहचान नहीं
है रुकी रुकी से सांस पग मे जान नहीं
यदि तुम साथ जब तक चल रही हो मधुरे
मैं पराजय मान अपनी रुकु भी तो कैसे
बीच नदी गहरी है पतवारें भी टूटी है
यह नौका समझ लो अब डूबी या तब डूबी
पर यह जो तुमने पाल टांग दी आँचल की
अब  मैं प्राण लहरों से डरु भी तो कैसे
बना दिया जाम जब तुमने अपने हाथों से
प्रिये बोलों मैं इंकार करूँ भी तो कैसे   
    

दिनेश सक्सेना

मंथन

कविता 

टुकड़ा चूडी का 


आज अकस्मात सूनी सी संध्या मे
जब मैं यूँ ही पुस्तकें देख रहा था
किसी काम मे जी बहलाने को
एक पूर्व किताब के बीच रखा था
तुम्हारी लाल चूड़ी का छोटा टुकड़ा
गोरी कलाइयों मे जो तुम पहने थी
उन्मादी रंग भरी मिलन  रात मे
मैं वैसा का वैसा ही रह गया सोचता
 सारी पिछली मिलन की  बातों को
कांच कोर से उस रंगीन  टुकड़े पर
उबरने लगी तुम्हारी सब लज्जित आकृतियाँ
मिलन बंधन मे चूड़ी का यूँ झर  जाना
निकल गयी सपने जैसी  वह मीठी रातें
याद दिलाने लगा यही लाल छोटा टुकड़ा

दिनेश सक्सेना

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

रात नशीली 



दूधिया चाँद को लेकर ,नशीली रात आयी है 

झिलमिल चाँदनी,छम छम थिरकती रागनी

बिजली रूप में लहराती,श्वेत बरसात आयी है

जले मधु रूप बाती,सौंदर्य प्रणय रूप मदमाती 

मिलन के मधुर स्वप्नों की ,बरात आयी है

सजी सुर्ख फूलों से राहे,जगी उन्मुक्त चाहते 


रही जो अब तक मन मे ,लबों पर बाते आयी है

नशीली रात आयी है, नशीली रात आयी है






दिनेश सक्सेना

राजनीति

अरविन्द केरीवाल और त्यागपत्र 



अरविन्द  केजरीवाल के मुख्य मंत्री पद के त्यागपत्र से यह सर्वविदित हो गया की जनलोकपाल को लेकर दिल्ली विधान सभा मे दो दिनों तक जिस तरह हंगामे के स्तिथि रही उसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता !वास्तव मे केजरीवाल अपनी जिम्मेदारिओं से भागने के लिए कोई सुरक्षित मार्ग तलाश रहे थे ताकी ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ा जा सके !वही हुआ भी !दिल्ली की  जनता अपने को ठगा सा महसूस कर रही है !हंगामे और त्यागपत्र को लेकर विपक्ष की भी आलोचना की जा सके ,किन्तु केजरीवाल जिस तरह से अपने को संवेधानिक व्यवस्था और परम्पराओं के ऊपर स्थापित करने की कोशिश मे लगे रहे ,उससे ही इस तरह की स्तिथि अधिक बनी !मुख्या विपक्षी पार्टी भाजपा से लेकर सरकार समर्थित कांग्रेस वा अन्य विधायक भी जनलोकपाल का विरोध नहीं कर रहे थे !उनका यह तर्क न्याय सांगत था की संविधान की मर्यादाओं का पालन किया जाये और नियम तथा कानून के दायरे  मे इसे विधानसभा मे पेश किया जाये !कोई भी संविधान के ऊपर नहीं होता !संविधान की अवहेलना की जायगी तो अराजकता उत्पन्न होगी !

अब यदि विपक्ष यह आरोप लगता है कि अरविन्द केजरीवाल जनलोकपाल को लेकर अड़े हुए है तो इसमें गलत क्या है ! केजरीवाल केवल देश की बुनयादी समस्याओं से जनता का ध्यान हटाना चाहते है इस लिए उन्हे यह मार्ग अधिक सुगम और सरल लगा !उनके त्यागपत्र से अनेक प्रशन उत्पन्न होते है ,कि  यह एक जगह टिक कर काम क्यों नहीं कर पाते ! आई आई टी से इंजीनियरिंग की पर नौकरी से भागे , आई ए  एस. की परीक्षा दी और अपना पद छोड़ कर चल दिए ,आर टी आई का कार्य किया छोड़ कर अन्ना के आंदोलन मे घुस गए ,वहाँ से भागे आ आ पा पार्टी बनाई मुख्यमंत्री बने त्यागपत्र दे कर भाग लिए !इन यक्ष प्रश्नो के उत्तर जनता को तलाशने होंगे कि केजरीवाल ही क्यों सब जगह से भागते है क्यों नहीं वोह एक जगह टिक कर कार्य कर पाते ?उनकी समस्या क्या है यह भी जानना होगा जनता को !सबसे बड़ा प्रशन का भी उत्तर ढूंढ़ना होगा की क्या कोई संवैधानिक पद पर बैठ कर धरना प्रदर्शन कर सकता है !

आखिर क्यों केजरीवाल आरोपों की  राजनीति पसंद करते है ? इनकी सरकार की ओर  से उप राज्यपाल पर आरोप लगाया कि राज्यपाल व्यवस्थाओं की अनदेखी कर रहे है वोह अपने को दिल्ली का वायसराय समझते है ,केजरीवाल क्यों भूल जाते है कि उप राज्यपाल का पद एक संवैधानिक पद है  इसका सम्मान किया जाना चाहिए !सारी राजनीतिक पार्टियों पर आरोप कि  सब बेईमान है और केवल मैं अकेला ईमानदार हूँ ,सब चोर है मैं शाह हूँ !क्यों केजरीवाल को घड़ी घड़ी अपनी ईमानदारी का डंका पीटना पड़ता है ! पिछले चवालीस दिन के शासन का आंकलन करे तो ज्ञात होगा कि केजरीवाल के लिए दिल्ली की जनता और उसके हित नहीं केवल केजरीवाल की अपनी महत्वाकांक्षा ज्यादा मायने रखती है !यह सही है की शायद पहले कभी दिल्ली वालों को  इतना नकारात्मक सोच का मुख्या मंत्री नहीं मिला जितना की अरविन्द  केजरीवाल रहे है ! नकारात्मकता मे अरविन्द केजरीवाल ने सारे  रिकार्ड तोड़ दिए !


दिनेश सक्सेना

मंथन

कविता

याद रुलाती रही


आँख रह रह कर बरसती रही
हम भुलाते रहे याद आती रही
आत्मा सुलगी धुंआ सा छागया
आँख भीगी प्यासा कुआँ पा गया
रोते रोते कुछ बात याद आ गयी
नीर बहता रहा तुम मुस्कुराती रही
गोधूली मे डाल पर मंद मंद चलती हवा
फिर मुझे अपलक किसी ने देखा
मुड़ कर देखता हूँ तो कोई नहीं
मेरी छाया मुझको चिढ़ाती रही
एक छायांकन है एक  है  दर्पण
जब भी होता है किसी से सामना
मैं समझ नहीं पाता कि मैं कौन हूँ
आकृति उलझनों को बढ़ाती रही

दिनेश सक्सेना

मंथन

मानव 

कहते है जीवन चक्र सा चलता रहता है
पशु से जन्मा मानव
तो क्या फिर मानव पशु बन जायेगा
देख हाल वर्तमान का
शंका मन में आयी है
जन्म-मृत्यु , धर्म-अधर्म ,पाप-पुण्य , नीति-अनीति
का लेखा-जोखा सब करते रहते है
मानव मन से मर रही मनुष्यता
इस पर विचार क्यूँ बाकी है
क्यूँ आँखे बंद खड़े है हम
जंगल में फिर जाने को
रेनू सिंह 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

राजनीति

काली मिर्च ,सांसद और हंगामा 


संसद मे काली मिर्च का प्रयोग सांसदों द्वारा किया जाना ,माइक तोड़ना ,असभ्य भाषा का प्रयोग ऐसे किया गया कि पूरा देश ही शर्म सार हो गया ! भारत की छवि देश विदेशों मे भी कोंग्रेस्सी सांसदों के कारण धूमिल हुयी है !अलग तेलंगाना राज्य गठन का विरोध करने के लिए इस तरह के कृत्य को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सका है ! यह ऐसा कृत्य था जो अपने पीछे अनेक सवाल छोड़ गया ! प्रशन यह है की 2001 मे हुये  संसद के बहार आतंकवादी हमले को बड़ा  माना जाये या संसद के अंदर हुए इस हमले को बड़ा माना जाए !
संसद के बहार हमला विदेशियों द्वारा रचा एक धिनौना कृत्य था ,संसद के अंदर हुए इस हमले मे देश के चुने हुए सांसदों के कारण जो शर्मिंदगी देश को उठानी पडी है आखिर उसका उत्तरदायित्व कौन लेगा ,क्या सरकार ,स्पीकर या संसदयीय  कार्य मंत्री ! इन सारी हरकतों से देश सन्न रह गया !उत्पात मचाने वाले 17 सांसदों को   लोकसभा से निलम्बित कर दिया गया और  अपने कर्त्तव्य पालन की  खाना पूर्ती कर , सरकार अपने को फिर पाक साफ़ सिद्ध करने का प्रयास कर, इस कृत्य का पटाक्षेप करना चाहती है !

लेकिन निलम्बन ना तो इस मुद्दे का हल है और ना ही  स्पष्टीकरण की हालत जिसने देश को इस हालात तक पहुंचा दिया है !संसद मे तेलंगाना की मांग जिस तरह से तेज होती हुयी आक्रामक रूप लेती गयी ,वोह किसी से छुपी नहीं है !सरकार औए कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह पता था कि आज नहीं तो कल उसे यह मांग स्वीकार करनी ही पड़ेगी ! फिर सरकार ने इसके दुष्प्रभावों से निपटने की कोई तैयारी नहीं की ?क्या यह सरकार की चूक नहीं है ?जब उग्र प्रतिकिर्याएँ  सामने आने शुरू हो गयी ,उसके बाद भी कोई ऐसा संकेत ना तो केंद्र सरकार के ओर से मिला और ना ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कि वह हालात सम्हालने के लिए कमर कास चुके है ! सीमांध्र के लोगो को समझने की कोशिश क्यों नहीं की गयी ?वहाँ के जन प्रतिनिधियों को विश्वास मे क्यों नहीं लिया गया ?इस विषय पर इतने जल्दी मे  फैसला क्यों लिया गया ? यह यक्ष प्रशन आज भी ज्यों  के त्यों खड़े है ! क्या कांग्रेस वोट बैंक के लिए ही कार्य करने मे ही अपनी रूचि रखती है !कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व क्या मानसिक रूप से दिवालिया हो गया ?क्या उसे इस कृत्य से कोई शर्मिंदगी नहीं है ?

सांसदों का निलम्बन  क्या पर्याप्त है उनके विरुद्ध अपराधिक मामले मे कार्यवाही क्यों नहीं की गयी !यह ऐसे प्रशन है जिनके उत्तर मिलने अभी बाकी है !काली मिर्च का स्प्रे महिलाओं की सुरक्षा के लिए बना था या संसद मे बैठे संवेधानिक पदाधिकारिओं के इस्तमाल के लिए ,आज संसद मे मिर्च स्प्रे जा रहा है कल हो सकता है की संसद के अंदर आग्नेय शस्त्र  भी ले जाये जाने लगे !इन सबसे बचने के लिए क्या सांसदों की तलाशी नहीं होनी चाहिये कब तक  हम देश की मर्यादा को इस प्रकार क्षत विक्षप्त होते देखते रहेंगे !

देश को जो शर्मिंदगी उठानी थी उठा चुका  !क्या भाविष्य मे सरकार यह सुनिश्चित करेगी की इस तरह की घटना की पुनरावृति न हो ! इसके लिए क्या उपाय किये जा रहे है सरकार और कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व के  द्वारा यह देश जानना चाहता है !देश के लोग यह भी मांग करते है कि ऐसी अपराधिक प्रवृति के सांसदों के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्यवाही की जाये !

वास्तव मे देखा जाये तो इस सब के लिए हम सब ही कही न कही जिम्मेदार  है !देश की जनता सही व्यक्ति को नहीं चुन कर भेजती है संसद  मे ,वोह अपना वोट कभी जाती,धर्म,बाहुबल के आधार पर  देकर लोकतंत्र के स्वरुप को ही ध्वस्त कर रही है !फिर भी लोकतंत्र मे लोकतंत्र के मंदिर की मर्यादा को जो चोट चंद सांसदों द्वारा पहुंचायी गयी  है वह निंदनीय है उसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता !!!!!

दिनेश सक्सेना

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता 

क्या हुया 


कैसे  क्या  हुआ  कि  दिन  ?
स्य्हा  पड़ गया  !
मेरे  मन  के  कोने  टूटे 
स्वर  शब्द  डूब  गए 
शायद  हम  अधिक  मिले 
कि  अब  सबसे  उूब  गए  
बंद  पलकों  के  आगे  सहसा 
जल  प्रपात फूट  गया 
धीरे  धीरे  तुम  उठे  
बिना  कुछ  कहे  चल  दिए 
हम  होले से  उठाये  स्वम  को 
बिना  सहे  चल  दिए 
खुद  बा  खुद  शब्द  ही सारे मूक  हुए
कैसे  क्या  हुआ  कि  दिन  ?
स्य्हा  पड़ गया  !


दिनेश सक्सेना

मंथन

कविता 

हैरान 


मेरे अन्तः मंथन संग्राम मे 
मैं बिखर के  रह गया हूँ !
मेरे प्रियतमे 
मेरे पास आओ 
मेरे बालों को सहृदयता के साथ 
फिर से सहला दो 
तुम्हारी हथेली का स्पंदन 
मेरे सर से स्पर्श होते ही 
देगा मुझे ------------
एक लम्बी शांती 
मुझसे तुम्हारी दूरियां  कैसी 
करीब आओ अपनी छाया से 
मेरे सर को अलग ना करों 
आह इससे तो मेरा
जीवन ले लो !!!!!!!!!!

दिनेश सक्सेना

मंथन



कविता

माँ तेरे लिए 



                                  
 कमी क्या हो गई माँ दूध मे तेरी,
या  परवरिश  मे आज कल
क्यूँ लूटते है इज्ज़तें  सड़को पर
अबलाओं की आज कल
क्या तेरा दूध भी हो गया बाजारू आज कल
क्यूँ दे रही संताने ऐसी
शर्मसार जो तुझको कर रही है आज कल
वो भी तो सोये तेरे ही आँचल मे होगे
जो छीन लेते है जिस्म से कपड़े, आबरू आज कल
किस मोह मे आज भी तू अबला बनी है
कोख मे ही लड़कियों को गर मर जाने तू दे रही
तो ख़ामोश दरिंदों के लिए बैठ क्यूँ गई है आज कल
माँ तेरे लिए ये प्रश्न मेरा है, क्यूँ सोचती नही है ?
मेरे जैसों के लिए तू आज कल
कब तक घुटन बंदिशों में जीते रहे हम
 तेरी प्रबल इच्छाओं के आज कल ?

.................... रेनू सिंह

मंथन

कविता 

एक  सपना


श्रृंगार छूटा ,भाव मन घायल ,
धुंद की भेट हुयी कल्पना मेरी!
वह करुण दृष्टी पडी धूमल,
अब भी है संकल्प मिलन!
एक सपना आज भी है,
एक शेष अपना वो कल!
आशा , विश्वास घायल,
उनके दर्शन का है संकल्प!
सपना है अब आस मिलन,
कर्म  छूटा भक्ती घायल!!

दिनेश सक्सेना


बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

मंथन

कविता

मंजिल

जहाँ मेरी कोई पहचान नहीं ,
वँहा मेरा नया आशियाना है!
जहाँ जरूरत नहीं अपनी है,
वहाँ वहाँ मेरा ठीकाना  है!
इसी कश्मकश मे मन है,
फिर भी मेरा मन तडफता है!
मंजिल मेरी दूर थी इतनी ,
रस्ते मे ही शाम हो गयी !
कोई साथी ना मिला मुझे ,
कोई हमसफ़र ना मिला !
जिंदगी मंजिल तक पहुँचती कैसे,
रहा मे काँटे थे और  मन था अकेला !
विश्वास डोलने लगा मंजिल बीच राह,
तूफ़ान इतने उठे कि विचलित हुआ मै !
हिम्मत बहुत बटोरी मन समझाया ,
मंजिल मेरी दूर थी इतनी!
रास्ते मे ही शाम हो गयी ,
पोर पोर पीर हुयी इतनी!
पाँव पाँव हुए छाले इतने ,
मंजिल मेरे  दूर थी इतनी!
रास्ते मे ही शाम हो गयी !!!

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

एहसास

कहानी

दीप दीवाली

कल्पना  बड़े अरमानों से ऋचा को अपने घर की बहु बना कर लायी थी ,किन्तु जिद्दी अहंकारी ऊपर से माँ की उल्टी सीख पाकर ऋचा ने कल्पना को वो रंग ढंग दिखाए की बेटे की शादी के सारे सपने धूल  धूसरित हो गए ,

अरमान धरे के धरे रह गए ऐसा क्या हुआ जिसकी वजहा से यह सब देखना पड़ा !


 बहु ओ बहु कब से चिल्ला रही हूँ सुनती ही नहीं है , एक हफ्ते से तुम्हारे कपडे गुसलखाने मे पड़े है ,उन्हे धो कर फैला  दो ! कल्पना ने घर मे झाड़ू लगाते हुए कहा ! उधर से आवाज़ आयी  ""ठीक है फैला दूंगी ,आप तो मेरे पीछे ही पड़  जाती है "" बहु ने भी अत्यंत तेज आवाज़ मे ही उधर से उत्तर दिया ""इसमें चिल्लाने की क्या बात है ?""चिल्लाने की बात क्यों नहीं है कपडे मेरे है ,फट जायेंगे तो आपसे मांगने नहीं आउंगी !जिसने मेरा हाथ थामा है वही खरीद कर भी लाएगा !आपके सिर मे क्यों दर्द होने लगता है ?""बहु अपने कमरे से बोलती हुई बहार निकली और तेज क़दमों से चलती हुई गुसलखाने मे घुस गयी ! सारा गुस्सा कपड़ों पर उतारती हुयी बोली "अब इस घर मे रहना नरक मे रहने जैसा हो गया है !मेरा थोड़ी देर आराम करना भी किसी को नहीं सुहाता है !इस घर के लोग तो यह चाहते है की यहाँ नौकरानी बनकर रहूँ ! मेरा शरीर पत्थर का बना है !""

अपने इकलौते बेटे यश के लिए कल्पना ने बहुत सी  लड़कियां देखने के बाद ऋचा का चुनाव किया था यश के लिए !ऋचा दूध की तरहा गोरी और बी. कॉम तक पडी लिखी लड़की थी ,इसलिए ऋचा को भा  गयी थी और घर आते ही घोषणा कर दी थी की मेरी बहु यही बनेगी !इस तरह कल्पना ने अपने बेटे का विवहा दो साल पहले ही ऋचा के साथ कर दिया था !ऋचा अपने पूरे परिवार की लाड़ली थी ,ख़ास तौर पर अपनी माँ की !इसलिए वोह जिद्दी ,स्वार्थी एवं अहंकारी थी ,उसके घर मे उसकी माँ का ही शाशन चलता था ! बच्चपन  से ही उसकी माँ ने ऋचा को यही  पाठ पढ़ाया था कि शादी के बाद जितनी जल्दी हो सके अपना घर अलग कर लेना ,संयुक्त परिवार मे रहेगी तो सास ससुर की सेवा करनी पड़ेगी !

वैसे कल्पना का परिवार भी सम्पन्न था किसी चीज़ की कमी नहीं थी ,पर ऋचा के परिवार के सम्मुख कुछ उन्निस था !कल्पना के पति रमेश एक डिग्री  कॉलज  मे प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे और खाली समय मे अपना कोचिंग क्लास चलाते  थे ! पत्नी कल्पना एक सुघड़ गृह्णी थी अतः वोह बहुत सोच समझ के घर चलाती थी ! रमेश ने अपने इकलौते बेटे को भी अच्छी शिक्षा दिलायी थी !इस समय यश एक कंपनी मे प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्य कर रहा था !इसलिए उसे कभी कभी नियमित अंतराल पर कार्यवश बहार जाना पड़ता था ! यश जनता था की उसके माँ बाप ने कितनी कठिनाई से उसको शिक्षा दिलायी है !इसलिए उसका झुकाव हमेशा अपने माता -पिता के ओर अधिक रहता था ! वोह अपने वेतन मे से कुछ पैसे माँ -बाप को देकर  बाकी वेतन अपनी पत्नी के हाथ मे देता था !

2 -3 महीने ऋचा ने यह सब सहन किया ,तथा यहाँ की सारी जानकारी वह अपनी माँ को बताना कभी नहीं भूलती थी ,दिन भर की सारी घटनाये वह अपनी माँ को बताती थी ,फिर शुरू होता था उसकी माँ का उसे भड़काने का खेल ! माँ के कहे अनुसार ऋचा ने पहले अपने पति पर शाशन चलाना शुरू किया फिर धीरे धीरे पूरे घर पर अपना शाशन शुरू कर दिया ! बात यही तक होती तो नही ठीक था पर ऋचा ने तो हद तब कर दी जब उसने सास ससुर से लड़ना और जली कटी  सुनाना उसकी दिनचर्या मे शामिल हो गया ! इस कारण घर मे शान्ती का नामो निशाँ ख़त्म हो गया ! इन सबसे बचने के लिए कल्पना भी पड़ोस मे एक कमरा लेकर बच्चों को पढ़ाने लगी जिससे उसका समय भी कट जाता और वोह कलेश से भी बची रहती थी ! रमेश इन्ही सब कलेश की वजह से रोज कॉलेज से देर से आने लगे ,लगभग यही तरीका यश ने भी अपना लिया और अपनी दिनचर्या बदल दी ! विकल्प यश के पास एक ही था या तो वह किराये का अलग मकान ले या अपनी दिनचर्या मे बदलाव करे !!

शाम को जब यश ऑफिस से आया और अपने कमरे मे गया तो देखा कि उसकी पत्नी ऋचा बाल बिखेरे ,अस्तव्यस्त कपड़ों मे गुस्से से भरी बैठी थी !यश ने पूछा ""आज क्या हुआ !इस तरह क्यों बैठी हो ?आज फिर माँ से झगड़ा हुआ क्या ?"" ""और क्या तुम्हारी माँ कभी मुझसे प्यार से बात करती है ?""शेरनी की तरह गुर्राते हुए उसने मुझसे कहा और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे ,इसी के साथ ऋचा ने दोपहर का सारा व्रतांत नमक मिर्च लगा कर बता दिया !पुरुष सब कुछ सहन कर सकता है पर सुन्दर स्त्री के आंसू सहन नहीं कर सकता !यश  ने तुरंत निर्णय लिया और सुना  दिया कि कल वह इस घर को छोड़ देगा ,इतना सुनते ही ऋचा के आंसू कपूर की तरह उड़न छू हो गए !सोते जागते रात युही गुजर गयी और सुबहा होते ही  यश बहार चला गया !2 घंटे बाद यश लौट कर आया और माँ से बोला कि मैंने  अलग घर देख लिया है और मैं ऋचा के साथ दूसरे  मकान मे रहने जा रहे हूँ  !माँ ने कहा ""अपने पापा को आ जाने  दो उनसे बात करके चले जाना ""  " नहीं माँ अब मैं किसी का इंतज़ार नहीं करूंगा ,हर दिन की कलह से अच्छा है अलग रहना ,कम से कम शान्ति तो रहेगी " ""ठीक है मैं तुम्हे रोकूंगी नहीं क्योकी अब तुम बच्चे नहीं हो जैसा तुम्हे ठीक लगे करों !तुम्हे जिस सामान की आवश्यकता हो ले जा सकते हो और वैसे भी सब कुछ तुम्हारा ही है ""कांपती आवाज़ मे यश से कहकर कल्पना ड्राइंग रूम मे जाकर बैठ गयी ,उस समय उसकी आँखों मे आँसू थे जिन्हे वह बार बार अपने आँचल से पोछ रही थी !

थोड़ी  देर मे यश ट्रक ले आया और अपना समान उसमे रखवाने  लगा !आधे घंटे के बाद उसी ट्रक मे दोनों पति -पत्नी भी बैठ कर चले गए !कल्पना की हिम्मत नहीं हुई  कि वोह उन दोनों को बहार निकल कर जाते हुए देख सके !शाम को जब कल्पना के पति घर आये तो कल्पना  ने उन्हे सारा किस्सा सुनाया ,सुनने के बाद पति ने कहा चलो अच्छा है रोज रोज का कलेश तो ख़त्म हुआ अब दोनों जगह शान्ति रहेगी !पर उस रात दोनों पति पत्नी ने खाना नहीं खाया !दोनों को गए हुए लगभग आज एक वर्ष हो गया था !ठीक दीवाली के 10 दिन बाद दोनों ने घर छोड़ा था ! आज फिर दिवाली थी सब जगहा दीपक का प्रकाश था पर एक घर ऐसा भी था जिसने केवल एक शगुन का दिया जला कर बहार आँगन  मे रख दिया था वह परिवार था रमेश और कल्पना का !2 दिन बाद कल्पना पति को कार्य पर भेज कर खुद बच्चों को पढ़ाने आ गयी !जब वह पड़ा कर लौट रही थी तो उसे रास्ते मे एक औरत मिली जो कल्पना को जानती थी पर कल्पना उसे नहीं जानती थी ,उस महिला ने कल्पना को नमस्ते की और बोली के यश और ऋचा हमारे घर के पास ही रहते है !आज ऋचा की तवियत ज्यादा खराब है तभी तो उसके माकन मालिक उसे हॉस्पिटल ले गए है क्योंकि यश यहाँ नहीं है वह बहार गया है ऑफिस के काम से !ऋचा के डिलीवरी होने वाली है !

कल्पना ने उस औरत से पूछा कि कौन से हॉस्पिटल गए है तो उसने वर्मा नर्सिंग होम का नाम बता दिया !कल्पना जल्दी जल्दी घर आये और कुछ जरूरी सामान रख कर वर्मा नर्सिंग होम पहुँच गयी !वहाँ जाकर पता चला की ऋचा की हालत खराब है उसका ऑपरेशन होगा तो कल्पना ने तुरंत फ़ोन करके अपने पति को हॉस्पिटल बुला लिया !वहाँ सारी फीस जमा कर दी गयी और ऑपरेशन शुरू हो गया !वोह दोनों एक बेंच पर बैठे ऑपरेशन ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे !लेकिन ऋचा के मम्मी पापा अभी तक नहीं आये थे सूचना भेजने के बाद भी !इधर ऑपरेशन ख़त्म हो चूका था ,और नर्स ने आकर बताया की लड़की हुयी है ,माँ बच्ची दोनों ठीक है !करीब 4 घंटे बाद ऋचा को रूम मे लाया गया और उसके 3 घंटे बाद ऋचा ने आंखे खोली और देखा कि सिरहाने उसकी सास एक बच्ची को गोद मे लिए बैठी है !इस तरह कल्पना और रमेश ऋचा का ध्यान रखने लगे पर ऋचा के मम्मी पापा अभी तक नहीं आये !ऋचा को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गयी और उसे कल्पना अपने साथ घर लेकर आ गयी ! ऋचा अपनी सास और ससुर की सेवा भाव देखकर बहुत खुश हई और अपने माता पिता के प्रति उसका व्यवहार कुछ रूखा हो गया !अब तक यश भी वापिस आ चुका  था और उसने ऋचा से कहा चलो अपने घर चलते है पर ऋचा ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि अब वोह कही नहीं जायेगे यहे रहेगी अपने सास ससुर के पास !शायद उसे पता चल गया था की शादी के बाद ससुराल ही एक लड़की का घर होता है !!इस तरह एक वर्ष का सफ़र पूर्ण हुआ दिवाली के बाद से अगली दिवाली तक का !अब ऋचा अपने मम्मी पापा से भी अधिक बात नहीं करती थी और घर मे भी पूर्णतया शांती स्थापित हो चुकी थी ! संभवतया दीवाली के  एक दीप ने सम्पूर्ण जगत को रोशन कर दिया था। ……………………… 


दिनेश सक्सेना 

 

 


मंथन





कविता 

डर 

 अब हर बात से डर  लगता है 

अब हर अपने से डर लगता है 

बन तो सभी जाते है  अपने पर 

धोखा देने वालों से डर लगता है 

इस जहां मे लोगों के लिए बदल 

दिल गए है, झूटे लोगो से डर लगता है 

बहाते है जो अपनों का ही  खून 

अब खून के रिश्तों से ही डर लगता है !!

 

दिनेश सक्सेना

 




एहसास

कहानी

गलत  सोच

कामनी बहुत देर से रसोई मे खाना बना रही थी ,जिसके कारण उसे कमर दर्द और थकान होने लगी थी ! महमानों के आने का समय भी करीब आता जा रहा था ! दिवाली का अवसर था अतः बहु को उपहार लेकर अपने मायके भी जाना था ! तभी मायके से चंचल की माँ का फ़ोन आया कि उसके भाई और भाभी भी इंग्लैंड से आये हुए है ! अपने कार्य की व्यस्तता के कारण वोह उसकी शादी पर भी नहीं आ सके थे इसलिए वोह तुमसे और दामाद जी से अब मिलना चाहते है !
उधर कुकर की सीटी पूरे जोश से बज रही थी ! सीटी बजते ही कामनी  ने गैस बंद कर दी और ड्राइंग रूम मे आकर बैठ गयी जहाँ उसकी बहु चंचल गिफ्ट पैक करने मे व्यस्त थी !
""अरे मम्मी देखो ना मैं अपने भाई भाभी के लिए क्या गिफ्ट लायी हूँ ! बस पैक कर रही हूँ ………… आपको दिखाना चाहती थी पर जल्दी मे थी ,वोह सब अभी यहाँ आने वाले है ,इसलिए पैक कर दिए ! बहु ने कुछ पैक किये गिफ्ट की तरफ इशारा किया ,तभी उसका पति अंदर आया और चंचल से बोला कि एक कप चाय बना लाओ ! आज ऑफिस मे बहुत थक गया हूँ "" अरे आप देख नहीं रहे कि मै गिफ्ट पैक कर रही हूँ ! माजी आज आप ही बना दीजिये न चाय इनके लिए ! मुझे अभी तैयार भी होना है ! मेरी छोटी भाभी बहुत फैशनेबल  है !मुझे उनकी टक्कर पर ही तैयार होना है !""इतना कहकर चंचल अपने बाकी बचे गिफ्ट पैक करने मे फिर मशगूल हो गयी !

शाम को कामनी के यहाँ 10 -12 लोग बैठे हुए थे ड्राइंग रूम मे ! उनमे बहु के तीन भाई ,उनकी बीबियाँ ,बहु के मम्मी -पापा और बच्चे और उन सब के बीच महमानो के तरह कामनी की बहु चंचल भी विराजित थी !कामनी ने इशारे से अपनी बहु चंचल को  बुलाया और रसोई घर मे ले जाकर कहा। ""चंचल सबके लिए चाय बना दे ,तब तक मैं पकोड़े तल  लेती हूँ ""क्या मम्मी मायके से इतने सारे लोग आये है और मैं उनके साथ न बैठूं ,आप कह रही है कि मैं यहाँ काम करूँ ? कब से आपको बोला था कि एक नौकर रख लीजिये ,आप है की कुछ सुनती ही नहीं है !अब मुझसे काम को मत कहिये मेरे घर वाले मुझसे मिलने आये है !अगर मै यहाँ रसोई मे लगूंगी तो उनके आने का फायदा क्या ?इतना कहकर चंचल रसोई से बहार निकल गयी और कामनी ने शांत रहकर काम  करना ही उचित समझा !""

कामनी ने जैसे तैसे पकोड़े बना लिए ,और फिर चाय बनाने मे  लग गयी , चाय नाश्ता ड्राइंग रूम मे पहुंचकर वोह उल्टे पैर लौट आयी और खाना गरम करने मे व्यस्त हो गयी ! रसोई मे ठहाकों की आवाज़े जब तब उनके कानो तक अब भी पहुँच रही थे ! कामनी के पति एक दो बार रसोई मे आये यह कहने के लिए कि कुछ रोटियों  पर घी मत लगना ! चंचल की भाभी घी नहीं खाती है और खाना जल्दी लगाओ बच्चों को भूख लगी है ! कामनी तब और जल भुन गयी जब जाते जाते बहु की माँ ने कहा ""क्या बहनजी आप तो हमारे साथ दो पल भी नहीं बैठी ,कोई नाराजगी है क्या ? "" सबके जाने के बाद चंचल भी सोने चली गयी !

कामनी एकेले ही रसोई सम्हालने मे व्यस्त हो गयी ! अगले दिन कामनी का मन हुआ की वोह अपने पति और बेटे के साथ कल के हालात पर चर्चा करे पर दोनों ही जल्दी अपने अपने ऑफिस चले गए ! दो तीन दिन बाद फिर चंचल की भाभी चंचल से मिलने के लिए आ गयी और चंचल को भी वोह अपने साथ खरदारी के लिए ले गयी ! बेटे की शादी के बाद से यह सिलसिला अनवरत यूँही चलता रहा ! कभी किसी का जन्म दिन कभी किसी की शादी कभी कुछ तो कभी कुछ ……………चंचल के घर वालों के रोज रोज आने से कामनी तंग आ चुकी थी ! आखिर कार एक दिन कामनी ने इस विषय पर अपने पति के साथ चर्चा की "सुनो जी चंचल ना तो अपने घर की जिम्मेदारी सम्हालती है ना ही अपने पति  प्रतीक का ध्यान रखती है ,प्रतीक के सारे कम यहाँ तक कि उसके  खाने से लेकर कपडे तक मुझे ही धोने पड़ते है ! उसका बस एक ही काम है घूमना ,खाना बाज़ार  और मायके जाना ! लगभग दो साल पुरे होने जा रहे है शादी को ,बहु आज भी अधिकतर अपने मायके ही ज्यादा रहती है या फिर हर समय घर से बहार कभी खरीदारी के नाम पर कभी खाना खाने के नाम पर , बचा कुचा समय फ़ोन और लैप टॉप पर खेलने मे पूरा निकालती है !""
 
पति ने गम्भीरता पूर्वक अपनी पत्नी की सम्पूर्ण बात सुनी और कहा की देखो कामनी ""तुमको ही शौक था कि तुम्हारी बहु भरे पुरे खानदान की हो ,दिखने मे  सुन्दर हो ,स्मार्ट हो !तुमने स्वम ही तो चंचल को पसंद किया था ,कितनी लड़कियां नापसंद करने के बाद तुमने इसे चुना था ,अब तुम घर के मामले मे हम मर्दों को न डालो तो अच्छा है ,नहीं तो तूफ़ान आ जायेगा और घर भी दो जगह बँट जायेगा जो किसी भी द्र्ष्टिकोड़ से उपयुक्त नहीं होगा !"" इनकी बात सुनने के बाद मैं  सोचने पर विवश हो गयी की यह सच ही तो कह रहे है ,इन सब के लिए मैं स्वम उत्तरदायी हूँ !फिर भी अपना मन हल्का करने के लिए मेरे मन मे विचार आया क्यों ना मैं अपना दुःख अपनी बहन के साथ बांटू , इसी उथल पुथल मे कब अपनी बहन के घर पहुँच गयी पता ही नहीं चला ,वोह मेरे पड़ोस मे ही रहती थी !उसने मुझे देखा और बोली  ""दीदी आज मेरी याद कैसे आ गयी ""विभा ने मुझसे पूछा !""बस यूँ ही तू बता कैसी है ?"" मैं  तो ठीक हूँ दीदी पर आपको क्या हुआ आप तो कमजोर होती जा रही हो ""विभा ने कहा !संभवतया कामनी  की परेशानियां उसके चहरे पर भी झलकने लगी थी !
 
कामनी ने आपनी बात विस्तार से अपनी छोटी बहन को बतायी पर कोई अनुकूल निष्कर्ष नहीं निकला !कामनी इसको अब अपनी नियति ही मानने पर विवश हो गयी ! वोह समझ चुकी थी कि एक गलत सोच और अति महत्वकांशा  मे लिया गया निर्णय सदा गलत होता है ! अब समय निकल चुका  था भूल सुधार का ! उसने मान लिया था कि एक गलत सोच सबको बर्बाद कर सकती है। ............................ 

 

दिनेश सक्सेना