शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

मंथन,

कविता 

कौन हो तुम 


कर्तव्य के सतपथ पर नहीं जानता की
...............वह कौन है ..................
कोई शक्ती संजोय मानवाकृति या
................कोई देवी ...................
कोई तेज या आभायुक्त मुखमंडल
................वह संगमरमरी है .........
..................या ...........................
दीप्त -चक्षु -युक्त अधिपति मेरी या
.....................कोई ....................
................कोमल ह्रदय ..............
नहीं जानता की क्यों है आज भी उसका
.....................आसन उच्च .............
मेरे ह्रदय स्थल मे मेरा ,  आन्तर आज भी
उसको पूजता है ,मान उसे देवी देवी को की
तुम कौन हो ?कौन हो ? कौन हो ? .........
तुझसे है कितनो का संसार ,कितने पाने
..........को प्रेरणा है तैयार ....................
बस ना तुम  रुको ,ना तुम हिम्मत हार
लगा ठोकर हटा पर्वत रूप धारण कर देवी का
.............बस जा जन जन मे .....................
स्वप्न पथ पर जब भी मिलना मुझे ,वादा
मै मेरे मन की सुन्दरता दे करूँ स्वागत तेरा !!!!!!!!!!!!!!

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

मंथन,

कविता 


याद आई फिर मुझे


याद आई फिर मुझे तेरी वो मुलाकात
तेरा देखकर मुझे मुस्कुराना
और मेरा खुद को आश्चर्य से देखना
अपनी कमियों को ढूँढना
और सोचना तुम मुस्कुराई क्यूँ

समझ से परे था सखी
वो मित्रता का प्रथम आगाज़
धीरे-धीरे करीब आई परिचय हुआ
बैठने लगे साथ-साथ
टूटने लगी एक ही रोटी
दोनों की उँगलियों से
मुस्कुराने लगा फिर से बचपन
बढ़ने लगा विश्वास
सजने लगे जीवन के सपने
सुख दुःख मे चलने लगे
मिलाते हुये कदमों से कदम
सिमट गयी सारी दूरियाँ
बाहें कंधों पर आगये
मिलने लगे हर दिन गले
होली और ईद की तरह
दूर क्षितिज मे बुनने लगे सपने
होने लगी बीच हमारे वो भी बातें
जो कभी नही कर पाते है
रिश्ते खून के एक दूजे से
प्रगाढ़ हो गया
गहरे समुंद्र सा प्रेम हमारा
जिसमे घूमने लगे
बैठ मन की कश्ती में
एक दिन वो भी आया
ले सात फेरे तुम चली गई
और छोड़ गई पास मेरे
यादों का एक विस्तृत आकाश
और उस आकाश मे वो कोना
जहाँ आज भी तुम हो मै हूँ बैठी
पकडे एक दूसरे की कभी न छूटने वाली बाँहें
महक रही है जहाँ आज भी
हमारी मित्रता की खुश्बु
...............रेनू सिंह

गुरुवार, 22 मई 2014

मंथन

कविता 

नारी स्वाभिमान 


तुमको कुछ नहीं आता
कितना अजीब है
ये शब्दों का घाल मेल
एक ही पल में तुम्हारे अस्तित्व को
धूल में मिलाने वाला
कल मुझे भी ये वाक्य मिले
कल थोड़ा अजीब लगा था
पर आज चेहरे पर मुस्कान आ गयी
कल एक साथी ने कहा
तुम्हे कुछ नहीं आता
तो आज मै कहती हूँ
हे साथी मैंने कब कहा
मुझको सब कुछ आता है
तुम मेरे साथ चलो
मै तुमको पूर्ण कर दूँगी
मै तो खुद पर हँसती हूँ
क्यूँकि सच है कि
मुझको कुछ नहीं आता
नहीं आता मुझको
तुम्हारे अहम् के आगे झुकना
नहीं आता मुझको
तुम्हारे पैरों में गिर कर
अपनी खुशियों के लिए गिड़गिड़ाना
नहीं आता मुझेको
तुम्हारे निर्दयता के सामने टूट जाना
नहीं आता मुझको हर पल अश्रु बहाना
कहा आता है हमें कुछ
दृणता के साथ खड़े होकर
हर हाल में मुस्कुराने के सिवा


................ रेनू सिंह  


मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

मंथन

कविता 

दर्द बिखराब का 



सबसे छुपाकर वह पीड़ा हिर्दय की जो हंस दिया .
उसकी हंसी ने तो   आज मुझे    भी रुला दिया

सलीके से उठ रहा था हर एक दर्द का अक्ष
चेहरा बता रहा है की  आज कुछ गँवा दिया

आँखे रो रही थी जार जार आवाज़ मे ठहराव था
और दिल कहता है    मैंने सब    कुछ भुला दिया

खुद भी वह हमसे  बिछुड़कर अधूरा सा हो गया
मुझको भी भीड़ मे छोड़कर तनहा बना दिया !!! 

दिनेश सक्सेना

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

राजनीति



आज़म खान सेना को तो बख्श दो

लोक सभा चुनाव मे अधिक से अधिक वोट पाने के चक्कर मे नेता अपना मानसिक संतुलन खोते जा रहे है और विवादित व्यान बाजी कर रहे है !यह लोग संवैधानिक एवं लोकतान्त्रिक संथाओं को भी  निशाने पर लेने लगे है !वह अपनी मर्यादाएं तथा सीमायें भी भूलते जा रहे है ! इस सब मे हद तो आज़म खान ने पार की है कारगिल के ऊपर अपना अनर्गल व्यान देकर जिससे सेना का मनोबल भी टूटा है और सेना को दो भागों मे  विभक्त करने कि कोशिश की है धर्म के आधार पर !आश्चर्य होता है की यह नेता कितना गिरेंगे वोट पाने के चक्कर मे,आज़म खान ने कारगिल युद्ध को भी जाती और धर्म के चश्मे से ही देखा है जो केवल उनके अधकचरे ज्ञान का प्रतीक ही है ! समझ नहीं आता कि नेताओं का स्तर इतना नीचे तक गिर सकता है या फिर इनके खून के डी एन ए मे ही खराबी है या इनका खून जन्मजात ही गन्दा है !

भारतीये सेना धर्म के आधार पर नहीं जानी जाती है यहाँ ही सर्व धर्म सर्व भाव पाया जता है !सैनिकों के पहचान केवल भारतीय है इससे अधिक कुछ नहीं और होनी भी नहीं चाहिये !यहाँ ना कोई हिन्दू है और ना कोई मुस्लिम ,सिख या ईसाई है यहाँ उसका पहला धर्म राष्ट्र की सीमाओं के रक्षा करना ही है ! इतनी से बात इन मुस्लिम परस्त नेताओं की समझ मे क्यों नहीं आती यह एक विचारणीय प्रशन जिसका हल हर भारत वासी को खोजना पडेगा !कारगिल युद्ध जब हुआ था तब सम्पूर्ण भारत एक जुट था ना कोई मुसलमान था ना कोई हिन्दू ,सिख या ईसाई था वरन सब भारतीये थे !ऐसे मे सेना को धर्म के आधार पर बाँटने कि किसी भी कोशिश को क्षम्य नहीं कहा जा सकता !कम से कम सेना और सैनिकों को धर्म के नाम पर बाँटने की कोशिश से नेताओं को बाज आना चाहिये !चुनाव तो होते रहेंगे और उसमे हार जीत भी होती रहेगी !

राजनितिक लोग ही इस तरह की विदुवेश की बातें करेंगे तो भविष्य के बारे मे सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है ! हो सकता है कि अपनी बातों  को लेकर हमेशा विवादों मे रहने वाले आज़म खान ने  अनजाने मे तो ऐसा नहीं कहा होगा !इसे चुनावी धुर्वीकरण की एक गलत कोशिश के रूप मे ही लिया जाना चाहिये !इससे पहले भी आज़म खान ने भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार श्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी वेहद आपत्तिजनक वक्तव्य दिया है !नेताओं के इस तरह के किसी भी तर्क को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है !आज़म खान अपनी  भाषा सुधारों और यदि तम्हे कोई आपत्ति भारत से है तो पकिस्तान कुछ दिन रहकर देखो तुम्हे अपनी औकात पता चल जायगी !

दिनेश सक्सेना

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

मंथन

कविता

समझ हमारी 



हमारी समझ से अपेक्षित थी बस इतनी सी बात!
स्वप्न शीशे की तरह दुनिया सदा से  पत्थरों सी!!
हमारी समझ से .......................................

चाहत की थी आरजुओं की वह भी हमने पायी!
जिंदगी लायी थी  अपने साथ मे अनेकों साये !!
साये बहुत गहरे है ओर रोशनी बहुत हल्की सी!!!
हमारी समझ से ......................................

केवल यहाँ विराना ओर वहाँ सिर्फ तन्हाई सी!
जिंदगी हमको यह कहाँ से कहाँ ले आयी थी!!
भटक गयी हमसे मंजिल ओर खो गयी राह सी !!!
हमारी समझ से ......................................

क्या कोई जिंदगी बेचेगा क्या जिंदगी कोई काटेगा!
हमने तो अपने दामन मे ता उम्र समेटे है बस कांटे !!
इधर उनकी बरात चली उधर दूकान फूलों की सजी !!!
हमारी समझ से ...........................................

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

मंथन




कविता 

April Fools


विविधता में एकता का
एक मात्र उदाहरण भारत
संगम है त्रिनदियों का ही न,
भाँति-भाँति की लोंगो का भी
तो दिवसों की भरमार यहाँ
टुडे ईस मूर्ख दिवस आइ नाउ
आज परेशान बुद्धिमान सभी
इस बात को लेकर उठा-पटक है
भूले से बन न जायें मूर्ख कहीं
सतर्क बुद्धि को रखें है
बुद्धि के मान की नाप-तौल
मूर्ख सूत्र दिवस में उलझे है
मै भी उलझन में उलझी हूँ
खुद का आपमान करूँ कैसे हाहाहा 
तो मूरख कहाँ से लाऊँ 
दूजे को बोलूँ तो उल्टी गाली खाऊं 
फिर बधाई किसको दूँ
जग को या ख़ुद को हाहाहाहा
पर लाइन बड़ी बारीक़ यहाँ
मै जग को जग मुझको मूरख कहता
क्यूँ ? सोचा तुमने
मै उसको वो मुझको विश जो करता हैं
अदृश्य मूर्ख की डोर से बंधे हुए
हम दोनों ही हँसते हैं
फिर भी खुद को बुद्धिमान कहते है
हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
………रेनू  सिंह

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

कविता

कविता 

लिखना पढ़ना ,पढ़ना लिखना
कुछ दुनियाँ के सच को
कुछ उड़ती अपनी कल्पनाओं को
भॅवर जाल सा बनता जाता
खुद का जीवन
सत्य असत्य की माया में
कितना अदभुद है न
शब्दों का ये माया जाल
मै कोशिश करती हूँ
हर दिन हर पल
शब्दों को थोडा तोडूँ
सच से थोडा मोडूँ
पाप नहीं बस प्यार लिखुँ
दुनियाँ का सुंदर अहसास लिखुँ
पर अन्दर थोडा पागलपन है 
अच्छा लगता है सच पढ़ना
तो अच्छा कैसे लगता
सच को झूठ लिखना
मै कैसे लिखुँ खुश हूँ तेरी दुनियाँ में
कैसे लिखुँ मुझको तुझ पर विश्वास है पूरा
तूने भी निष्पक्ष कहाँ लिखा जीवन मेरा
......रेनू 

मंथन

कविता

हम


पहले आरजू थी ज़िंदगी में ,ज़िदगी फूलों सी हो
कम्बख्त आज तो आरज़ूओं में ज़िंदगी ही डूब गई
वो लूटते रहे हमें बन हमारे हमराज, हमराह
हमारी ख़ुमारी तो देखिये, हम उन्ही के लिए
गलियों में नाचते गाते और चिल्लाते रहे
जो आज तक लूटते रहे, हम उन्ही का गुण गाते रहे
बच्चा-बच्चा लड़ा इस देश के लिए
और ये नेता देश को बाँटते रहे
बहते लहू इनको दिखते नहीं
रंग अपने घरों में ये लगाते रहे
मांग उजड़ती रही, लाज लुटती रही
ये तिरंगें का कफ़न चढ़ाते रहे
अपनी महफ़िलों में बेबसों को नचाते रहे
सो चुके हो बहुत अब तो जाग जाओ
त्याग कर इस ख़ुमारी को
बहार घरों से तो आओ
सोते रहे तो रात होगी न ख़त्म
सपनों का सूरज न मुस्काएगा
लड़ चुके दुश्मनों से बहुत आज कल
अब इनसे लड़ो और इनको हराओ
आरजू जो अधूरी रही आज तक
उस आरजू-ए-भारत को खुद ही बनाओ
मुर्दे नहीं हैं जो समशान तक भी
चलने को हमको कंधे चाहिये
ज़िंदगी फूल बन जायेगी
ज़िंदा है हम पहले ये तो दिखाये......

.रेनू सिंह

गुरुवार, 20 मार्च 2014

राजनीति

नेता


भारत से किसी कुप्रथा, बिमारी, अपराध व बुराई के ख़तम होने का मतलब, नेताओं की एक बहुत बड़ी फ़ौज का समाप्त हो जाना है, कुछ तो जड़ से ही समाप्त हो जायेंगे।
मै किसी पार्टी की हिमायती नहीं हूँ, न ही किसी पार्टी की बुराई कर रही हूँ, न ही किसी को अच्छा और न ही किसी को बुरा बताने कि कोशिश कर रही हूँ। क्यूँकि मै वही करती हूँ, जो सबके लिए सही होता है। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं।  दहेज़ एक कुप्रथा है, एक ऐसी बीमारी जिससे पूरा देश पीड़ित है, ये ऐसी बीमारी है, जिसका प्रभाव आज भी इतना है कि कही-कही तो ये पूरे परिवार को निगल जाती  है। पर आज के नेता एक दूसरे पर दोषारोपण करने के लिए, इसका भी सहारा लेने से नहीं चूकते, एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते है।  आज एक नेता ने दूसरे की अमीरी पर कहा कि अगर वो दुनियाँ के सबसे अमीरों में गिनी जाती है, दहेज़ तो वो लेकर नहीं आई तो ये पैसा कहा से आया। हाहाहाहाहा अब आप लोग बताओ दहेज़ जैसी कुप्रथा कभी जड़ से ख़त्म होगी। जब अमीर होने के लिए दहेज़ इतना इम्पोर्टेन्ट है, मै ये नहीं कहती हूँ, जिस नेता को ये कहा गया वो दूध की धूलि होंगी, पर क्या उनकी कमियों और बुराइयों को गिनाने के लिए और अमीर होने के लिए दहेज़ जरुरी है, अगर आज वो दहेज़ लाई होती तो, चोर होने के बाद भी कोई उन्हें चोर न कहता हाहाहाहाहाहा वाह रे फ़िल्मी नेता।

सुबह-सुबह जो आज खुली हमारी आँख
बनने को इंटेलिजेंट टीवी में लगा लिए समाचार
वही भारतीय घरों की खिच-खिच थी
सास-बहु और देवरानी-जेठानी की थी खीचा-तान
कितना लाई है दहेज़ में जो करती है अभिमान
पर ये सास-बहु और देवरानी-जेठानी थी कुछ खाश
है ये देश की खेवन हार, इन्हीं सबके हाथों में है देश की पतवार
विद्वान है चिल्लाते दिन और रात
कि राज्य को चाहिए दे शिक्षा मनुष्य करे सदाचार
पर आज के नेता करते है अपना-अपना प्रचार
सदाचार जाये भाड़ में इनको तो बस करना है बार-बार
पार्टी आल नाईट पार्टी आल नाईट क्यूँ दोस्तों :)

.........रेनू सिंह 

मंथन

 
कविता

संतुष्टि


असंतुष्ट
प्रत्येक
व्यक्ति
क्यूँ ?
क्या?
कैसे?
में उलझा
क्या ऐसा ही ?
ये ही जीवन है।
जन्म मिला है
तो निश्चित मृत्यु भी है
फिर बीच का जीवन
इतना असंतुष्ट क्यूँ है
चलिये कुछ करते है
संतुष्टि जिससे मिल पाये
बस ध्यान हमे ये रखना है
पाकर जिसको ख़ुशी मिले
सच्चे मन से पाने का प्रयास करें
देकर जिसको संतुष्ट रहे
बिना भेद के देने का प्रयास करे 
जीवन से जो हम चाहें
क्या वो हमको संतुष्ट करे
सोचें समझे तब ही
अपने क़दमों को मंजिल की ओर करे
मृत्यु से पहले न
मृत्यु से जीवन का वरण करें
खुशियाँ दे खुशियाँ पायें
आओ कुछ ऐसा काम करे
सोन चिरैया भारत का हम
फिर से निर्माण करे
क्या रखा है ऐसे जीवन में
जिसमे खुद ही असंतुष्ट रहे
......................... रेनू  सिंह

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

एहसास




खिचड़ी 


कई दिनों से कुछ लिखा नहीं, क्यूँकि लोग मेरी पोस्ट पर अपना दिमाग चमकाने लगे थे, जिसकी चमक से मेरी आँखे भी चुंधियाने लगी, तो सोचा थोडा ब्रेक ले लू , आज माँ ने कहा..काहिल, कामचोर होली आ गई है, अपना रूम तो साफ कर लो, कुछ नही करना तो , हम भी प्रसन्न मन से उठे सोचे क्यूँ न आज पहले कई दिनों से जमी खोपड़ी की धूल, मिट्टी झाड़ दू कुछ लिख कर, पर लिखुँ क्या ? आज खिचड़ी लिखती हूँ, वही खिलाती हूँ, तो आज कुछ खिचड़ी ही खा लीजिये बाकि तो होली में पकवान खायेंगे ही , आज जीवन , मृत्यु, धर्म, राजनीत, दोस्ती, प्यार, व्यापार, शिक्षा सब थोड़ा-थोड़ा......

जीवन...सुंदर है पर थोड़ी मुश्किलें भी है, जीवन में करने तो हमेशा सद्कर्म ही चाहिए, पर कौन कौन से कर्म कर डालते है लोग, समझ से परे , तो अपने काम से काम रखिये, जीवन सुंदर ही रहेगा, दुसरो के चक्कर में पड़े तो समझो घनचक्कर बने, दुसरो को समझ तो कभी पाओगे नहीं, और खुद से भी हाथ धो लोगे सो टेक केअर l

मृत्यु..जीवन का आखिरी पड़ाव, वैसे तो मनुष्य की प्रवृति है, सब कुछ अपनी इच्छा अनुसार प्राप्त करने की, पर मृत्यु ही एक ऐसी दसा है, जो इंसान को अपनी इच्छा अनुसार प्राप्त नहीं होतीl शायद इसी ज़िद ने "इच्छा मृत्यु" की इच्छा को जन्म दिया, और मनुष्य ने इसकी भी मांग कर डाली वैसे सही भी है, इससे जीने की इच्छा को बल मिलेगा ,और जो बच्चे अपने बूढ़े माँ बाप को छोड़ देते है, या अन्य कारणों से जो व्यक्ति जीना नहीं चाहता, वो ससम्मान मर तो सकेंगे , जीवन की एक यही न्यूज़ मुझे सबसे अच्छी और आकर्षक लगी l

धर्म...वैसे तो मुख्यतः चार ही है, जिसको मैंने बचपन से जाना देखा और सुना, पर इसके बेटे, नाती पोते, बहुत है l तो खट पट हमेशा चलती है, कहते है न कि जहा चार बर्तन होते है, वहा खट पट होगी ही तो हो रही है, सब एक दूसरे के बाप बनने की कोशिश मे हमेशा, इसी लिए इसके मूल को भूल गये सब l ईश्वर एक थे हमेशा, पर अब बहुत हो गये है, लोग अपने-2 को बुलाते है, और बार-बार कपड़े बदल-बदल कर भगवान थक गये है, तो चाहे जो बुलाये आते नहीं l पर मै याद करती हूँ तो आते है, क्यूँकि मै बोल देती हूँ, जिस कपड़े में बैठे है उसी में आइये तभी l

राजनीत...बाप--बेटा--बेटी--बहु फिर नाती, पोते यही है..प्रजातंत्र की राजनीत, सब बदलाओ की आश में पर बदलेगा क्या ? जो विरासत में मिलेगा उसी की तो प्रस्तुति होगी, कपड़े नये और मॉर्डन होंगे बस , यानि चोर-चोर मौसेरे भाई ,प्रजातंत्र मे आग लगाई ,रोटी बनाई और सबने मिल बाँट कर खाई ,और जनता बुझी राख सी उड़ती रहे l

दोस्ती...बस शब्दों में रह गई है, क्यूँकि आज सब अपने जीवन और खुद को साबित करने में व्यस्त है, और खुद को स्थापित करने के लिए कुछ भी कर जाये, तो दोस्त कौन दुश्मन कौन आज पहचान मुश्किल है, पर इसका अहसास आज भी मस्त है सुखद है।

प्यार..तूने मारी एन्ट्री यार दिल मे बजी घंटी यार यही है प्यार, दर्द का सागर है, पर करना हर कोई चाहे, कुल मिला कर शक्तिशाली है, इंसान को इंसान से जोड़ता ही है।

व्यापार-व्यापारी..जो जितना धनवान वो उतना ही बड़ा चोर, ईमानदारी इनकी तिजोरी में बन्द, पर देश इन्ही से चलता है, तो सौ खून माफ़, सब खा कर भी ढाकर नहीं लेते।

खेल-खिलाड़ी...कुछ बने भगवान इसी मे, तो कुछ चोरों से कर गठबंधन बने सैतान, फिर भी मेरा देश महान , तो भगवानों को ससम्मान प्रणाम।

शिक्षा...सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय टॉपिक पर इसकी हालत खस्ता, चोरों और अनपढ़ो के हाथों नीव का निमार्ण , मासूमों के हाथों में नाममात्र का तखती और बस्ता l क्या होगा कल भगवान ही जाने ?

स्वास्थ..इसमें एक महत्वपूर्ण बात....रोग का घर होते है पुराने तकिये, तो प्रत्येक दो साल मे बदल दे , अब घूरो न हमे, गर्ल फ्रेंड बस चले तो रोज बदलो, और तकिया बदलने के लिए..माँ, बहन की तरफ देखते हो, खुद बदल देना कोई न बदले तो, नही तो आगे चल कर gf भी नही बदल पाओगे।

इतना लिखे इससे ये तो साबित ही हो गया, न कि हम कामचोर नही है वाह......... 

रेनू  सिंह









मंथन

कविता 

शर्मीली 


जहान मे मित्र मेरा एक जो बहुत शर्मीला है
बैठी है इस अभिमान मे कि वह बहुत हसीं है

पड़ी एक बार मेरी नज़र जो उनपर भूल से
वह सोचने लगी कि रुख उसका जहीन है

वह समझती यूँ सब उससे ही मुखातिब है
अपनी नज़र को वह माने बहुत महीन है

जोड़ रही वह मुझसे वास्ता बिन बात ही
बस उसका यही अंदाज़ तो शानदार है

खुदा जाने कैसे दिलाऊ मै उसको यकीन
उससे बहुत ही  अलहदा  मेरी जमीन है

दिनेश सक्सेना

गुरुवार, 13 मार्च 2014

मंथन

कविता 

साथी बचपन का 


सुखी रहो तुम सदा बस हमारी आशीष यही है
साथ हम ना हो तुम्हारे तब ये सोचना सही है

मित्रता को तो कभी फुर्सत से सोचा ही नही है
हम ना मिलेंगे कभी ऐसी सोच हो सक्ती नही है

बचपन मै खेले साथ पड़े साथ साथ ही सपने बुने
मिलन के पलों मै ऐसा लगा बने एक दूजे हम है

वह जब रूठ जाती थी तो मै उसे मनाता बहलाता था
हर पल दुःख मै तुम्हे पास अपने ही पाता सदा मै था

आँख में मेरी अश्रु देख् कर तुम सहम सी जाती थी
कभी कुछ ना माँगा हमेशा सब कुछ तुमने दिया था

तेरी सारी पीड़ा मुझे मिल जाएँ बस यही चहता में हूँ
खुश रहे तू सदा बस हृदय से मै रब से मांग्ता यहीहूँ

दिनेश सक्सेना  

बुधवार, 12 मार्च 2014

राजनीति

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती 


राजनीतिक पार्टी भले ही दागियों पर राजनीति कर रही हो किन्तु इतना तो स्पष्ट है कि अब सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर पूरी तरह से सख्त रुख अख्तियार कर रही है ,अपने हाल के निर्देश मे शीर्ष अदालत ने जिस तरह का कडा रुख अपनाया है  वह सरहानीय है !इससे स्पष्ट है कि आने वाले दिन आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों के लिए अत्यंत कष्टकारी हो सकते है !शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों को कहा है कि वह सांसदों और विधायकों पर चल रहे भ्रस्टाचार तथा अन्य गम्भीर मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूर्ण करे !आवश्यकता होने पर मामलों की सुनवाई रोज करने को कहा है !राजनीति से जुड़े लोगों खासकर सांसद और विधायक से सम्बंधित मामले लंबे समय तक अदालतों मे चलते रहते है और उनपर फैसला नहीं आ पाता !देर होने से यह सन्देश भी जाता है कि मुक़दमे चलते रहने से उनके खिलाफ कुछ होने वाला नहीं है !किन्तु अब लगता है ,यह अधिक दिन चलने वाला नहीं है !ऐसा इस लिए कि अभी कुछ महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के आधार पर लालू प्रसाद यादव और रशीद मसूद जैसे शीर्षथ नेताओं को संसद से अपनी सदस्यता गवानी पडी है !

इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति का अपराधीकरण इस  बीच बहुत तेजी से बड़ा है !संसद और विधानसभाओं मे गम्भीर मामलों मे आरोपियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है ! ऐसा इसलिए हो रहा है कि राजनीतिक पार्टयियाँ चुनावी लाभ के लिए ऐसे बहुवालिओं को चुनाव मे उतारती है जो अपने बहु बल से चुनाव जीत सके ! इससे कोई पार्टी अछूती नहीं है !वह इस तर्क का सहारा लेती रहती है कि जब तक  कोई दोषी करार न कर दिया जाये वह निर्दोष ही है जबकी यह कोई तर्कसंगत बात नहीं है यह केवल एक कुतर्क ही है जो पार्टयिों द्वारा दिया जाता है !ऐसे मे यह आशा करना इन पार्टयिों से बेमानी होगा कि वह स्वम इस पर कोई अंकुश लगाएंगी ! इस कारण सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा निर्णय अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है !यदि इसपर पूरी तरह अमल हो गया तो देश के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलभ्धी होगी और इससे देश को एक नई दिशा तथा नई सोच मिलेगी ! देश मे भ्रष्टाचार भी कम होगा तथा राजनीति मे   शुचिता भी आयेगी ! कोई आश्चर्य नहीं कि सोलहवी लोकसभा मे  चुनकर आये अनेक  माननीयों को अपनी सदस्यता से भी हाथ धोना पड़  जाये !

सुप्रीम कोर्ट ने जो आशा कि एक नई  किरण जगाई है उससे प्रतीत होता है कि आगे आने वाले समय मे राजनीतिक पार्टयियाँ अब सिद्धांतों की राजनीति करेंगी ! भ्रष्टाचार कम होगा और राष्ट्रवादी सोच का उदय होगा ! भारत को एक नई दिशा मिलेगी जिससे भारत की गिरती हुयी साख पुनः स्थापित होगी ! वैसे भी यह सब इतना आसान नहीं है पर उम्मीद तो जगी ही है ! समय के गर्भ से क्या निकल कर आता है यह कुछ समय बाद पता चलेगा !

दिनेश सक्सेना

राजनीति

कांग्रेस के घोटाले राहुल की ईमानदारी


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस चुनावी दौर मे जगह जगह जनसभाएं कर के अपनी ईमानदारी के ढोल पीट रहे है ! उनके भाषण केवल हास्यास्पद होकर रह गए है उससे अधिक कुछ नहीं ! राहुल गांधी अपनी जन सभाओं मे भा.जा.पा. पर हमला बोलते हुए उसे भ्रष्टाचार मे नंबर बन पार्टी बता रहे है ! यह भी कह रहे है कि हम अधिकारों की राजनीती करते है ,कांग्रेस गरीबों के सरकार  चलाती है पूंजीपतियों की नहीं ,राहुल का कहना है कि वह राज्य की हर उस सरकार का विरोध करेंगे जहाँ जहाँ बी जे पी की सरकार है ! हम  देश मे बी जे पी को भ्रष्टाचार नहीं करने देंगे ,उसके खिलाफ हमारे कार्यकर्ता सड़कों पर उतर कर विरोध करेंगे ! हम गरीबों की मदद करना चाहते है और यही हमारी लड़ाई है !

राहुल गांधी  इससे बड़ा कोई मजाक देश की जनता के साथ हो सकता है जो आप कर रहे है !राहुल जी ज़रा यह तो बताये कि केंद्र मे पिछले दस साल से आपकी सरकार मे जो घोटाले हुए है उन्होंने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए है ! आपकी साकार के इतने घोटाले है कि उनकी गिनती करने मे भी देश की जनता को साल लग जायेगा फिर भी पूरी होगी या नहीं यह प्रश्न समय के गर्भ मे छुपा है ! हैरानी तब होती है जब आपकी सरकार घोटाले करती रही और आप सोते रहे ,अरे कुछ तो शर्म करो इतना सब कुछ होने बाद भी आपको ईमानदारी का ढोल पीटते हुए ज़रा भी शर्म की अनुभूती नहीं होती क्या आपकी संवेदनाएं इतनी मर चुकी है या भ्रष्टाचार करना आपका और आपकी पार्टी का ही जन्म सिद्ध अधिकार हो गया है !

राहुल  जी ज़रा यह तो बतायें  कि आज बहुत अधिक ईमानदारी की बातें हो रही है ,क्या कांग्रेस को यह पता चल चुका है की उसका सूपड़ा साफ़ होने वाला है ? इसलिए वह अब गरीबों और ईमानदारी की बात कर रही है या भ्रष्टाचार पर आपका ही एकाधिकार है ! पहले तो आपके ही मंत्री कहते थे कि बीस साल या इससे अधिक रूपए कमाने वाला गरीब नहीं होता और हमने गरीबी मिटा दे है तो फिर आज गरीब कहाँ से आ गया ? आप जरा बीस रूपए मे अपना पेट भर कर दिखाओ , तब आपको पता चलेगा कि गरीबी क्या होती है ! उसकी समस्या क्या होती है ! आपके भाषण से तो यही प्रतीत होता है कि शायद आपका गरीबी से दूर का भी कोई नाता नहीं है !

अब कांग्रेस यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि जनता अब उसकी बातों  मे नहीं आने वाली है इसलिए आप इस तरह का छद्म ईमानदारी का लबादा औड़ कर जनता के बीच जाने का मन बना चुके है एक हारे हुए सिपाही की तरह ! कांग्रेस ने अपने कार्यकाल मे एक ही काम किया है वह है जातिवाद की बेल फैलाना ,मुस्लिम तुष्टीकरण ,आतंकवाद को बढ़ावा देना ! हिन्दू और मुसलमानो को अलग अलग दृष्टी से देखना जिससे साम्प्रादायिक तनाब बड़े और समाज विघटित हो जाये ! यही काम वह पिछले दस सालों से करती आ रही है !कभी कांग्रेस ने जनता कि आवाज नहीं  सुनी और राहुल गांधी कह रहे है कि हम  जनता के बीच मे है और जनता के हित के लिए लड़ेंगे ! पहले कहाँ गए थे राहुल गांधी जी जब उत्तराखंड आपदा आये थी ,जब देश पर संकट था तब आप कुम्भकर्णी  नींद मे थे क्या ? राहुल जी कुछ भी करो पर जनता से  उपहास मत करों !आप को ना तो देश का भूगोल पता है ना ही इतिहास किस आधार पर आप देश हित की बात करते हो ! नकसल  वाद ,जवानो की शहादत का हिसाब भी तो जनता को दो अपने भाषणो के माध्यम से या उम्र भर प्रत्यारोप की राजनीति ही करते रहोगे !

दिनेश सक्सेना

सोमवार, 10 मार्च 2014

मंथन

कविता 

मेरा दर्द 


मेरी जीवन की पुस्तक मे हर एक स्वप्न तुम्हारा था
कहानी तो मेरी थी पर वह कथानक तो तुम्हारा था

मेरी जीवन की यात्रा मे लोग तो यहाँ बहुत  सारे थे
पर मुझे जिसकी तृष्णा थी वह नाम तो तुम्हारा था

जो अकेले ही बह गए हम तुम्हारी स्मृति की बाड़ मे
मुड़ कर जो देखा तो बहुत दूर छूटा वह किनारा था

वह रात न वह दिन अपने, पर चाहतों का दौर तुम्हारा था
जो साथ रही यादें तेरी थी, ऋतुएं बदली पर तेरा साथ न था

मेरी नयनो  में अश्रु  और कितना दर्द दिल में सोया था
मुस्कराने वाले को क्या पता रोने वाला कितना रोया था  

दिनेश सक्सेना

शनिवार, 8 मार्च 2014

मंथन

कविता 

नारी दिवस  


नारी आज के दिन तुम श्रद्धा हो , नवरात्रि में देवी हो
बाकी दिन अद्धा प्उवा हो , कम कपड़ो वाली बेशर्म बेहया हो और

मालूम है क्यूँ, क्यूँकि खुद को कुछ तुमने कभी माना ही नहीं
पिता के घर बन बेटी, बहन तुम उनके लिये समार्पित रही

उनकी ईज्जत की खातिर तुम, अपनी इच्छाओं को चढ़ाती रही, बलि बेदी पर
पति के घर पत्नी, बहू, माँ बन खुद को ही मारती रही, किसी की ख़ुशी वंश की खातिर

त्याग किया बलिदान किया, समर्पित रही आजीवन तुम किस आशा में
बस इसी लिए कि एक दिन नारी का भी दिवस होगा

पर सच बोलना, शर्म के घुँघट से ही सही, शब्दो का तुम ओढ़ना मत आडम्बर
क्या तुमने जो चाहा जीवन भर, तुमको वो आज मिल पाया

ओढ़ सबला का आडम्बरो से भरा लबादा क्या नही आज भी तुम अबला......

................ रेनू  सिंह 





 




















गुरुवार, 6 मार्च 2014

मंथन


अपने ही घर में अजनबी हुई हिन्दी के लिए



हिन्दी तुझे नमन |
शत् - शत् बार नमन |

हिन्द की शान है तू , गौरव, गर्व, अभिमान है तू ,
दुनिया में हिन्द की सहृदयी पहचान है तू

हिन्दी तुझे नमन | शत् - शत् बार नमन |
तुझको तेरा मान मिले ,

खोया हुआ सम्मान मिले |
सूर्य प्रकाश सी फैले तू ,

तुझको ये वरदान मिले |
हिन्दी तुझे नमन | शत् - शत् बार नमन |

........रेनू सिंह

राजनीति

भारत की राजनीत 



भारत की राजनीत
जिन्दो पर राजनीत

मुर्दो पर राजनीत
हिजड़ो पर राजनीत

घायलों पर राजनीत
औरतों और लड़कियों पर राजनीत

उनके कपड़ो पर राजनीत
हिन्दू और मुस्लिम पर राजनीत

मंदिर और मस्जिद पर राजनीत
धर्म और अधर्म पर राजनीत

दंगो पर राजनीत
प्रेम सम्बन्धों पर राजनीत

बलात्कारों पर राजनीत
बाबा और साधुओं पर राजनीत

सपनों पर राजनीत
अपने अपने छेत्र के विकास पर राजनीत

ये है भारत की राजनीत
उल्झी हुई जनता इस राजनीत में

विविधता में एकता
वो अखण्ड भारत खो गया

वो राजनीत खो गई
इस भारत की राजनीत में

...................रेनू सिंह