शुक्रवार, 28 मार्च 2014

कविता

कविता 

लिखना पढ़ना ,पढ़ना लिखना
कुछ दुनियाँ के सच को
कुछ उड़ती अपनी कल्पनाओं को
भॅवर जाल सा बनता जाता
खुद का जीवन
सत्य असत्य की माया में
कितना अदभुद है न
शब्दों का ये माया जाल
मै कोशिश करती हूँ
हर दिन हर पल
शब्दों को थोडा तोडूँ
सच से थोडा मोडूँ
पाप नहीं बस प्यार लिखुँ
दुनियाँ का सुंदर अहसास लिखुँ
पर अन्दर थोडा पागलपन है 
अच्छा लगता है सच पढ़ना
तो अच्छा कैसे लगता
सच को झूठ लिखना
मै कैसे लिखुँ खुश हूँ तेरी दुनियाँ में
कैसे लिखुँ मुझको तुझ पर विश्वास है पूरा
तूने भी निष्पक्ष कहाँ लिखा जीवन मेरा
......रेनू 

मंथन

कविता

हम


पहले आरजू थी ज़िंदगी में ,ज़िदगी फूलों सी हो
कम्बख्त आज तो आरज़ूओं में ज़िंदगी ही डूब गई
वो लूटते रहे हमें बन हमारे हमराज, हमराह
हमारी ख़ुमारी तो देखिये, हम उन्ही के लिए
गलियों में नाचते गाते और चिल्लाते रहे
जो आज तक लूटते रहे, हम उन्ही का गुण गाते रहे
बच्चा-बच्चा लड़ा इस देश के लिए
और ये नेता देश को बाँटते रहे
बहते लहू इनको दिखते नहीं
रंग अपने घरों में ये लगाते रहे
मांग उजड़ती रही, लाज लुटती रही
ये तिरंगें का कफ़न चढ़ाते रहे
अपनी महफ़िलों में बेबसों को नचाते रहे
सो चुके हो बहुत अब तो जाग जाओ
त्याग कर इस ख़ुमारी को
बहार घरों से तो आओ
सोते रहे तो रात होगी न ख़त्म
सपनों का सूरज न मुस्काएगा
लड़ चुके दुश्मनों से बहुत आज कल
अब इनसे लड़ो और इनको हराओ
आरजू जो अधूरी रही आज तक
उस आरजू-ए-भारत को खुद ही बनाओ
मुर्दे नहीं हैं जो समशान तक भी
चलने को हमको कंधे चाहिये
ज़िंदगी फूल बन जायेगी
ज़िंदा है हम पहले ये तो दिखाये......

.रेनू सिंह

गुरुवार, 20 मार्च 2014

राजनीति

नेता


भारत से किसी कुप्रथा, बिमारी, अपराध व बुराई के ख़तम होने का मतलब, नेताओं की एक बहुत बड़ी फ़ौज का समाप्त हो जाना है, कुछ तो जड़ से ही समाप्त हो जायेंगे।
मै किसी पार्टी की हिमायती नहीं हूँ, न ही किसी पार्टी की बुराई कर रही हूँ, न ही किसी को अच्छा और न ही किसी को बुरा बताने कि कोशिश कर रही हूँ। क्यूँकि मै वही करती हूँ, जो सबके लिए सही होता है। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं।  दहेज़ एक कुप्रथा है, एक ऐसी बीमारी जिससे पूरा देश पीड़ित है, ये ऐसी बीमारी है, जिसका प्रभाव आज भी इतना है कि कही-कही तो ये पूरे परिवार को निगल जाती  है। पर आज के नेता एक दूसरे पर दोषारोपण करने के लिए, इसका भी सहारा लेने से नहीं चूकते, एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते है।  आज एक नेता ने दूसरे की अमीरी पर कहा कि अगर वो दुनियाँ के सबसे अमीरों में गिनी जाती है, दहेज़ तो वो लेकर नहीं आई तो ये पैसा कहा से आया। हाहाहाहाहा अब आप लोग बताओ दहेज़ जैसी कुप्रथा कभी जड़ से ख़त्म होगी। जब अमीर होने के लिए दहेज़ इतना इम्पोर्टेन्ट है, मै ये नहीं कहती हूँ, जिस नेता को ये कहा गया वो दूध की धूलि होंगी, पर क्या उनकी कमियों और बुराइयों को गिनाने के लिए और अमीर होने के लिए दहेज़ जरुरी है, अगर आज वो दहेज़ लाई होती तो, चोर होने के बाद भी कोई उन्हें चोर न कहता हाहाहाहाहाहा वाह रे फ़िल्मी नेता।

सुबह-सुबह जो आज खुली हमारी आँख
बनने को इंटेलिजेंट टीवी में लगा लिए समाचार
वही भारतीय घरों की खिच-खिच थी
सास-बहु और देवरानी-जेठानी की थी खीचा-तान
कितना लाई है दहेज़ में जो करती है अभिमान
पर ये सास-बहु और देवरानी-जेठानी थी कुछ खाश
है ये देश की खेवन हार, इन्हीं सबके हाथों में है देश की पतवार
विद्वान है चिल्लाते दिन और रात
कि राज्य को चाहिए दे शिक्षा मनुष्य करे सदाचार
पर आज के नेता करते है अपना-अपना प्रचार
सदाचार जाये भाड़ में इनको तो बस करना है बार-बार
पार्टी आल नाईट पार्टी आल नाईट क्यूँ दोस्तों :)

.........रेनू सिंह 

मंथन

 
कविता

संतुष्टि


असंतुष्ट
प्रत्येक
व्यक्ति
क्यूँ ?
क्या?
कैसे?
में उलझा
क्या ऐसा ही ?
ये ही जीवन है।
जन्म मिला है
तो निश्चित मृत्यु भी है
फिर बीच का जीवन
इतना असंतुष्ट क्यूँ है
चलिये कुछ करते है
संतुष्टि जिससे मिल पाये
बस ध्यान हमे ये रखना है
पाकर जिसको ख़ुशी मिले
सच्चे मन से पाने का प्रयास करें
देकर जिसको संतुष्ट रहे
बिना भेद के देने का प्रयास करे 
जीवन से जो हम चाहें
क्या वो हमको संतुष्ट करे
सोचें समझे तब ही
अपने क़दमों को मंजिल की ओर करे
मृत्यु से पहले न
मृत्यु से जीवन का वरण करें
खुशियाँ दे खुशियाँ पायें
आओ कुछ ऐसा काम करे
सोन चिरैया भारत का हम
फिर से निर्माण करे
क्या रखा है ऐसे जीवन में
जिसमे खुद ही असंतुष्ट रहे
......................... रेनू  सिंह

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

एहसास




खिचड़ी 


कई दिनों से कुछ लिखा नहीं, क्यूँकि लोग मेरी पोस्ट पर अपना दिमाग चमकाने लगे थे, जिसकी चमक से मेरी आँखे भी चुंधियाने लगी, तो सोचा थोडा ब्रेक ले लू , आज माँ ने कहा..काहिल, कामचोर होली आ गई है, अपना रूम तो साफ कर लो, कुछ नही करना तो , हम भी प्रसन्न मन से उठे सोचे क्यूँ न आज पहले कई दिनों से जमी खोपड़ी की धूल, मिट्टी झाड़ दू कुछ लिख कर, पर लिखुँ क्या ? आज खिचड़ी लिखती हूँ, वही खिलाती हूँ, तो आज कुछ खिचड़ी ही खा लीजिये बाकि तो होली में पकवान खायेंगे ही , आज जीवन , मृत्यु, धर्म, राजनीत, दोस्ती, प्यार, व्यापार, शिक्षा सब थोड़ा-थोड़ा......

जीवन...सुंदर है पर थोड़ी मुश्किलें भी है, जीवन में करने तो हमेशा सद्कर्म ही चाहिए, पर कौन कौन से कर्म कर डालते है लोग, समझ से परे , तो अपने काम से काम रखिये, जीवन सुंदर ही रहेगा, दुसरो के चक्कर में पड़े तो समझो घनचक्कर बने, दुसरो को समझ तो कभी पाओगे नहीं, और खुद से भी हाथ धो लोगे सो टेक केअर l

मृत्यु..जीवन का आखिरी पड़ाव, वैसे तो मनुष्य की प्रवृति है, सब कुछ अपनी इच्छा अनुसार प्राप्त करने की, पर मृत्यु ही एक ऐसी दसा है, जो इंसान को अपनी इच्छा अनुसार प्राप्त नहीं होतीl शायद इसी ज़िद ने "इच्छा मृत्यु" की इच्छा को जन्म दिया, और मनुष्य ने इसकी भी मांग कर डाली वैसे सही भी है, इससे जीने की इच्छा को बल मिलेगा ,और जो बच्चे अपने बूढ़े माँ बाप को छोड़ देते है, या अन्य कारणों से जो व्यक्ति जीना नहीं चाहता, वो ससम्मान मर तो सकेंगे , जीवन की एक यही न्यूज़ मुझे सबसे अच्छी और आकर्षक लगी l

धर्म...वैसे तो मुख्यतः चार ही है, जिसको मैंने बचपन से जाना देखा और सुना, पर इसके बेटे, नाती पोते, बहुत है l तो खट पट हमेशा चलती है, कहते है न कि जहा चार बर्तन होते है, वहा खट पट होगी ही तो हो रही है, सब एक दूसरे के बाप बनने की कोशिश मे हमेशा, इसी लिए इसके मूल को भूल गये सब l ईश्वर एक थे हमेशा, पर अब बहुत हो गये है, लोग अपने-2 को बुलाते है, और बार-बार कपड़े बदल-बदल कर भगवान थक गये है, तो चाहे जो बुलाये आते नहीं l पर मै याद करती हूँ तो आते है, क्यूँकि मै बोल देती हूँ, जिस कपड़े में बैठे है उसी में आइये तभी l

राजनीत...बाप--बेटा--बेटी--बहु फिर नाती, पोते यही है..प्रजातंत्र की राजनीत, सब बदलाओ की आश में पर बदलेगा क्या ? जो विरासत में मिलेगा उसी की तो प्रस्तुति होगी, कपड़े नये और मॉर्डन होंगे बस , यानि चोर-चोर मौसेरे भाई ,प्रजातंत्र मे आग लगाई ,रोटी बनाई और सबने मिल बाँट कर खाई ,और जनता बुझी राख सी उड़ती रहे l

दोस्ती...बस शब्दों में रह गई है, क्यूँकि आज सब अपने जीवन और खुद को साबित करने में व्यस्त है, और खुद को स्थापित करने के लिए कुछ भी कर जाये, तो दोस्त कौन दुश्मन कौन आज पहचान मुश्किल है, पर इसका अहसास आज भी मस्त है सुखद है।

प्यार..तूने मारी एन्ट्री यार दिल मे बजी घंटी यार यही है प्यार, दर्द का सागर है, पर करना हर कोई चाहे, कुल मिला कर शक्तिशाली है, इंसान को इंसान से जोड़ता ही है।

व्यापार-व्यापारी..जो जितना धनवान वो उतना ही बड़ा चोर, ईमानदारी इनकी तिजोरी में बन्द, पर देश इन्ही से चलता है, तो सौ खून माफ़, सब खा कर भी ढाकर नहीं लेते।

खेल-खिलाड़ी...कुछ बने भगवान इसी मे, तो कुछ चोरों से कर गठबंधन बने सैतान, फिर भी मेरा देश महान , तो भगवानों को ससम्मान प्रणाम।

शिक्षा...सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय टॉपिक पर इसकी हालत खस्ता, चोरों और अनपढ़ो के हाथों नीव का निमार्ण , मासूमों के हाथों में नाममात्र का तखती और बस्ता l क्या होगा कल भगवान ही जाने ?

स्वास्थ..इसमें एक महत्वपूर्ण बात....रोग का घर होते है पुराने तकिये, तो प्रत्येक दो साल मे बदल दे , अब घूरो न हमे, गर्ल फ्रेंड बस चले तो रोज बदलो, और तकिया बदलने के लिए..माँ, बहन की तरफ देखते हो, खुद बदल देना कोई न बदले तो, नही तो आगे चल कर gf भी नही बदल पाओगे।

इतना लिखे इससे ये तो साबित ही हो गया, न कि हम कामचोर नही है वाह......... 

रेनू  सिंह









मंथन

कविता 

शर्मीली 


जहान मे मित्र मेरा एक जो बहुत शर्मीला है
बैठी है इस अभिमान मे कि वह बहुत हसीं है

पड़ी एक बार मेरी नज़र जो उनपर भूल से
वह सोचने लगी कि रुख उसका जहीन है

वह समझती यूँ सब उससे ही मुखातिब है
अपनी नज़र को वह माने बहुत महीन है

जोड़ रही वह मुझसे वास्ता बिन बात ही
बस उसका यही अंदाज़ तो शानदार है

खुदा जाने कैसे दिलाऊ मै उसको यकीन
उससे बहुत ही  अलहदा  मेरी जमीन है

दिनेश सक्सेना

गुरुवार, 13 मार्च 2014

मंथन

कविता 

साथी बचपन का 


सुखी रहो तुम सदा बस हमारी आशीष यही है
साथ हम ना हो तुम्हारे तब ये सोचना सही है

मित्रता को तो कभी फुर्सत से सोचा ही नही है
हम ना मिलेंगे कभी ऐसी सोच हो सक्ती नही है

बचपन मै खेले साथ पड़े साथ साथ ही सपने बुने
मिलन के पलों मै ऐसा लगा बने एक दूजे हम है

वह जब रूठ जाती थी तो मै उसे मनाता बहलाता था
हर पल दुःख मै तुम्हे पास अपने ही पाता सदा मै था

आँख में मेरी अश्रु देख् कर तुम सहम सी जाती थी
कभी कुछ ना माँगा हमेशा सब कुछ तुमने दिया था

तेरी सारी पीड़ा मुझे मिल जाएँ बस यही चहता में हूँ
खुश रहे तू सदा बस हृदय से मै रब से मांग्ता यहीहूँ

दिनेश सक्सेना  

बुधवार, 12 मार्च 2014

राजनीति

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती 


राजनीतिक पार्टी भले ही दागियों पर राजनीति कर रही हो किन्तु इतना तो स्पष्ट है कि अब सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर पूरी तरह से सख्त रुख अख्तियार कर रही है ,अपने हाल के निर्देश मे शीर्ष अदालत ने जिस तरह का कडा रुख अपनाया है  वह सरहानीय है !इससे स्पष्ट है कि आने वाले दिन आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों के लिए अत्यंत कष्टकारी हो सकते है !शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों को कहा है कि वह सांसदों और विधायकों पर चल रहे भ्रस्टाचार तथा अन्य गम्भीर मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूर्ण करे !आवश्यकता होने पर मामलों की सुनवाई रोज करने को कहा है !राजनीति से जुड़े लोगों खासकर सांसद और विधायक से सम्बंधित मामले लंबे समय तक अदालतों मे चलते रहते है और उनपर फैसला नहीं आ पाता !देर होने से यह सन्देश भी जाता है कि मुक़दमे चलते रहने से उनके खिलाफ कुछ होने वाला नहीं है !किन्तु अब लगता है ,यह अधिक दिन चलने वाला नहीं है !ऐसा इस लिए कि अभी कुछ महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के आधार पर लालू प्रसाद यादव और रशीद मसूद जैसे शीर्षथ नेताओं को संसद से अपनी सदस्यता गवानी पडी है !

इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति का अपराधीकरण इस  बीच बहुत तेजी से बड़ा है !संसद और विधानसभाओं मे गम्भीर मामलों मे आरोपियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है ! ऐसा इसलिए हो रहा है कि राजनीतिक पार्टयियाँ चुनावी लाभ के लिए ऐसे बहुवालिओं को चुनाव मे उतारती है जो अपने बहु बल से चुनाव जीत सके ! इससे कोई पार्टी अछूती नहीं है !वह इस तर्क का सहारा लेती रहती है कि जब तक  कोई दोषी करार न कर दिया जाये वह निर्दोष ही है जबकी यह कोई तर्कसंगत बात नहीं है यह केवल एक कुतर्क ही है जो पार्टयिों द्वारा दिया जाता है !ऐसे मे यह आशा करना इन पार्टयिों से बेमानी होगा कि वह स्वम इस पर कोई अंकुश लगाएंगी ! इस कारण सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा निर्णय अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है !यदि इसपर पूरी तरह अमल हो गया तो देश के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलभ्धी होगी और इससे देश को एक नई दिशा तथा नई सोच मिलेगी ! देश मे भ्रष्टाचार भी कम होगा तथा राजनीति मे   शुचिता भी आयेगी ! कोई आश्चर्य नहीं कि सोलहवी लोकसभा मे  चुनकर आये अनेक  माननीयों को अपनी सदस्यता से भी हाथ धोना पड़  जाये !

सुप्रीम कोर्ट ने जो आशा कि एक नई  किरण जगाई है उससे प्रतीत होता है कि आगे आने वाले समय मे राजनीतिक पार्टयियाँ अब सिद्धांतों की राजनीति करेंगी ! भ्रष्टाचार कम होगा और राष्ट्रवादी सोच का उदय होगा ! भारत को एक नई दिशा मिलेगी जिससे भारत की गिरती हुयी साख पुनः स्थापित होगी ! वैसे भी यह सब इतना आसान नहीं है पर उम्मीद तो जगी ही है ! समय के गर्भ से क्या निकल कर आता है यह कुछ समय बाद पता चलेगा !

दिनेश सक्सेना

राजनीति

कांग्रेस के घोटाले राहुल की ईमानदारी


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस चुनावी दौर मे जगह जगह जनसभाएं कर के अपनी ईमानदारी के ढोल पीट रहे है ! उनके भाषण केवल हास्यास्पद होकर रह गए है उससे अधिक कुछ नहीं ! राहुल गांधी अपनी जन सभाओं मे भा.जा.पा. पर हमला बोलते हुए उसे भ्रष्टाचार मे नंबर बन पार्टी बता रहे है ! यह भी कह रहे है कि हम अधिकारों की राजनीती करते है ,कांग्रेस गरीबों के सरकार  चलाती है पूंजीपतियों की नहीं ,राहुल का कहना है कि वह राज्य की हर उस सरकार का विरोध करेंगे जहाँ जहाँ बी जे पी की सरकार है ! हम  देश मे बी जे पी को भ्रष्टाचार नहीं करने देंगे ,उसके खिलाफ हमारे कार्यकर्ता सड़कों पर उतर कर विरोध करेंगे ! हम गरीबों की मदद करना चाहते है और यही हमारी लड़ाई है !

राहुल गांधी  इससे बड़ा कोई मजाक देश की जनता के साथ हो सकता है जो आप कर रहे है !राहुल जी ज़रा यह तो बताये कि केंद्र मे पिछले दस साल से आपकी सरकार मे जो घोटाले हुए है उन्होंने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए है ! आपकी साकार के इतने घोटाले है कि उनकी गिनती करने मे भी देश की जनता को साल लग जायेगा फिर भी पूरी होगी या नहीं यह प्रश्न समय के गर्भ मे छुपा है ! हैरानी तब होती है जब आपकी सरकार घोटाले करती रही और आप सोते रहे ,अरे कुछ तो शर्म करो इतना सब कुछ होने बाद भी आपको ईमानदारी का ढोल पीटते हुए ज़रा भी शर्म की अनुभूती नहीं होती क्या आपकी संवेदनाएं इतनी मर चुकी है या भ्रष्टाचार करना आपका और आपकी पार्टी का ही जन्म सिद्ध अधिकार हो गया है !

राहुल  जी ज़रा यह तो बतायें  कि आज बहुत अधिक ईमानदारी की बातें हो रही है ,क्या कांग्रेस को यह पता चल चुका है की उसका सूपड़ा साफ़ होने वाला है ? इसलिए वह अब गरीबों और ईमानदारी की बात कर रही है या भ्रष्टाचार पर आपका ही एकाधिकार है ! पहले तो आपके ही मंत्री कहते थे कि बीस साल या इससे अधिक रूपए कमाने वाला गरीब नहीं होता और हमने गरीबी मिटा दे है तो फिर आज गरीब कहाँ से आ गया ? आप जरा बीस रूपए मे अपना पेट भर कर दिखाओ , तब आपको पता चलेगा कि गरीबी क्या होती है ! उसकी समस्या क्या होती है ! आपके भाषण से तो यही प्रतीत होता है कि शायद आपका गरीबी से दूर का भी कोई नाता नहीं है !

अब कांग्रेस यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि जनता अब उसकी बातों  मे नहीं आने वाली है इसलिए आप इस तरह का छद्म ईमानदारी का लबादा औड़ कर जनता के बीच जाने का मन बना चुके है एक हारे हुए सिपाही की तरह ! कांग्रेस ने अपने कार्यकाल मे एक ही काम किया है वह है जातिवाद की बेल फैलाना ,मुस्लिम तुष्टीकरण ,आतंकवाद को बढ़ावा देना ! हिन्दू और मुसलमानो को अलग अलग दृष्टी से देखना जिससे साम्प्रादायिक तनाब बड़े और समाज विघटित हो जाये ! यही काम वह पिछले दस सालों से करती आ रही है !कभी कांग्रेस ने जनता कि आवाज नहीं  सुनी और राहुल गांधी कह रहे है कि हम  जनता के बीच मे है और जनता के हित के लिए लड़ेंगे ! पहले कहाँ गए थे राहुल गांधी जी जब उत्तराखंड आपदा आये थी ,जब देश पर संकट था तब आप कुम्भकर्णी  नींद मे थे क्या ? राहुल जी कुछ भी करो पर जनता से  उपहास मत करों !आप को ना तो देश का भूगोल पता है ना ही इतिहास किस आधार पर आप देश हित की बात करते हो ! नकसल  वाद ,जवानो की शहादत का हिसाब भी तो जनता को दो अपने भाषणो के माध्यम से या उम्र भर प्रत्यारोप की राजनीति ही करते रहोगे !

दिनेश सक्सेना

सोमवार, 10 मार्च 2014

मंथन

कविता 

मेरा दर्द 


मेरी जीवन की पुस्तक मे हर एक स्वप्न तुम्हारा था
कहानी तो मेरी थी पर वह कथानक तो तुम्हारा था

मेरी जीवन की यात्रा मे लोग तो यहाँ बहुत  सारे थे
पर मुझे जिसकी तृष्णा थी वह नाम तो तुम्हारा था

जो अकेले ही बह गए हम तुम्हारी स्मृति की बाड़ मे
मुड़ कर जो देखा तो बहुत दूर छूटा वह किनारा था

वह रात न वह दिन अपने, पर चाहतों का दौर तुम्हारा था
जो साथ रही यादें तेरी थी, ऋतुएं बदली पर तेरा साथ न था

मेरी नयनो  में अश्रु  और कितना दर्द दिल में सोया था
मुस्कराने वाले को क्या पता रोने वाला कितना रोया था  

दिनेश सक्सेना

शनिवार, 8 मार्च 2014

मंथन

कविता 

नारी दिवस  


नारी आज के दिन तुम श्रद्धा हो , नवरात्रि में देवी हो
बाकी दिन अद्धा प्उवा हो , कम कपड़ो वाली बेशर्म बेहया हो और

मालूम है क्यूँ, क्यूँकि खुद को कुछ तुमने कभी माना ही नहीं
पिता के घर बन बेटी, बहन तुम उनके लिये समार्पित रही

उनकी ईज्जत की खातिर तुम, अपनी इच्छाओं को चढ़ाती रही, बलि बेदी पर
पति के घर पत्नी, बहू, माँ बन खुद को ही मारती रही, किसी की ख़ुशी वंश की खातिर

त्याग किया बलिदान किया, समर्पित रही आजीवन तुम किस आशा में
बस इसी लिए कि एक दिन नारी का भी दिवस होगा

पर सच बोलना, शर्म के घुँघट से ही सही, शब्दो का तुम ओढ़ना मत आडम्बर
क्या तुमने जो चाहा जीवन भर, तुमको वो आज मिल पाया

ओढ़ सबला का आडम्बरो से भरा लबादा क्या नही आज भी तुम अबला......

................ रेनू  सिंह 





 




















गुरुवार, 6 मार्च 2014

मंथन


अपने ही घर में अजनबी हुई हिन्दी के लिए



हिन्दी तुझे नमन |
शत् - शत् बार नमन |

हिन्द की शान है तू , गौरव, गर्व, अभिमान है तू ,
दुनिया में हिन्द की सहृदयी पहचान है तू

हिन्दी तुझे नमन | शत् - शत् बार नमन |
तुझको तेरा मान मिले ,

खोया हुआ सम्मान मिले |
सूर्य प्रकाश सी फैले तू ,

तुझको ये वरदान मिले |
हिन्दी तुझे नमन | शत् - शत् बार नमन |

........रेनू सिंह

राजनीति

भारत की राजनीत 



भारत की राजनीत
जिन्दो पर राजनीत

मुर्दो पर राजनीत
हिजड़ो पर राजनीत

घायलों पर राजनीत
औरतों और लड़कियों पर राजनीत

उनके कपड़ो पर राजनीत
हिन्दू और मुस्लिम पर राजनीत

मंदिर और मस्जिद पर राजनीत
धर्म और अधर्म पर राजनीत

दंगो पर राजनीत
प्रेम सम्बन्धों पर राजनीत

बलात्कारों पर राजनीत
बाबा और साधुओं पर राजनीत

सपनों पर राजनीत
अपने अपने छेत्र के विकास पर राजनीत

ये है भारत की राजनीत
उल्झी हुई जनता इस राजनीत में

विविधता में एकता
वो अखण्ड भारत खो गया

वो राजनीत खो गई
इस भारत की राजनीत में

...................रेनू सिंह

मंथन


कविता 

यादें


कुछ यादें अमिट छाप सी होती है
ह्रदय पटल पर

कुछ यादें कुठारघात सी होती है
मस्तिष्क पटल पर

कुछ अविष्मरणीय दृश्यों के छाप
नेत्र पटल पर

हैं जहाँ अभी हम खड़े हुये
प्रभावित न जीवन उससे इतना

जितना यादें करती प्रभावित मानव जीवन
मानव मन और मानव तन

सुख दुःख का अविष्मरणीय संगम ये यादें


.......रेनू सिंह  

मंथन


 

कविता 

ये ज़िंदगी  


कभी वक़्त के साथ चलने की भागम-भागी
तो कभी सलीके से जीने की उलझन

छीन लेती है ज़िंदगी से उसकी की मुस्कान
कभी-कभी बेसलीका पीछे भी रहा कीजिये

मुस्कराने के लिये
देखा है मैंने बेसलीका जीकर बहुतों को मुस्कुराते हुये


...............रेनू सिंह





मंथन


कविता 


नज़रिया


वो दौर भी गुजरा
ये दौर भी गुजर जायेगा

समय को पकड़ेगा कौन
उसे तो गुजरना है गुजर जायेगा

आये पल ज़िंदगी मे जो खुशियों के पकड़ कर रखो
गम के पलों मे ये यादो का चमन काम आयेगा

वो फरिश्तों का दौर था जो गुजरा
ये इंसानो का दौर भी गुजर जायेगा

अगर दिखतें है अभी फूलों मे काँटे हमे
कभी वक़्त वो भी तो होगा

जब काँटों मे फूल नजर आयेगे.


.................रेनू सिंह

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

एहसास

व्यंग्य

इस भ्रष्टाचार को क्या नाम दूँ



रोज रोज चक्कर लगाने से क्या आपका काम हो जायेगा ,क्यों यहाँ आकर रोज सर पर बैठ जाते है ! अभी आपकी फ़ाइल मेरे पास नहीं आयी है जब आयेगी तब आना ! पर एस डी  आई कार्यालय से तो फ़ाइल डेढ़ महा पहले ही आ चुकी है यहाँ ,क्या बात करते हो इसका मतलब मैं  झूट बोल रहा हूँ आपसे ,जाइये जब फ़ाइल आयेगी तब आईयेगा !ठीक है धन्यबाद शर्मा जी मैं बाद मे आता हूँ ! एक सप्ताह बाद मैं फिर कार्यालय पहुंचा और बोला शर्मा ही नमस्कार , अरे भाई ………बैठ जाइये खड़े क्यों है ?शर्माजी बड़ी विनम्रता से बोले ! ठीक है धन्यबाद। ……… वह ऐसा है। ............. मुझे इस बात का डर है कही मैं बैठ गया तो मेरा दिल खड़ा न हो जाये इसलिए शर्माजी ,मुझे खड़ा ही रहने दे और मुझे संक्षेप मे यह बताइये कि क्या किया जाये ?मैंने अपना रंग बदलते हुए कहा !वह बोले आप तो बहुत विद्वान मास्टरजी है। अरे भाई ,बैठिये तो ,मुझे भी तो सेवा का मौक़ा मिले आपकी। पूरे कार्यालय मे तो आप आपको स्कूल मे पड़ने पढ़ाने से छुट्टी मिली नहीं। .......... अब सेवानिवृत हो गए है तो कम से कम अब तो हम आपके सान्निध्य का कुछ लाभ उठा सकें !शर्मा जी ने अपने खुर्राटपन  का प्रदर्शन किया !

मैं बैठ गया ! उन्होंने चपरासी को बुलाकर मेरे लिए पानी लाने  का आदेश दिया और मेरी तरफ मुखातिब होकर बोले आपने इतने दिन शिक्षा विभाग मे काम किया है फिर भी आप इस तरह बचपने की बात करते है यह उम्मीद नहीं थी आपसे ,शर्मा जी ने गिरगिट के तरह अपना रंग बदल कर कहा !मैं भी यही कहने वाला था कि आप लोगों ने मुझे इतने वर्षों मे परखा ही नहीं कि मैंने अपने सेवा काल मे कितनी कुर्बानियां दी है पर कभी अपने सिद्धांतों से समझोता नहीं किया ! मैं गर्व पूर्वक बोला ! शर्मा जी ने तब कहा कि आपने कितना नुक्सान किया है अपना ,कभी आपने अनुमान लगाया है ?लाखों रूपए का। …………… अगर आपने मात्र कुछ हज़ार खर्च कर दिए होते तो आज आपको कितना अधिक धन मिलता !अच्छा आप यह बताइये कि क्या हमने अपने सिद्धांत से समझोता किया है ,कभी हमने इन्क्रीमेंट या ट्रांसफर फ्री किया हो सदा ही इसके बदले कुछ न कुछ लिया ही है ऑफिस की भी आचार संहिता होती है और हम उसी के अनुरूप कार्य करते है !शर्मा जी ने बात साफ़ की ! इसका मतलब फ़ाइल यहाँ यूँही नहीं आयेगी मैंने उखड़ते हुए कहा !

उन्होंने बात को फ़ौरन संभाला ,अरे मान्यवर ,आपके घर से ऑफिस की दूरी मात्र पांच मिनट की है यहाँ तक पहुँचने मे पचास मिनट क्यों लग गए ? मैं  बताता हूँ रास्ते मे जाम मिला होगा और भी अवरोध आये होंगे तभी तो इतना समय लग गया ! शर्मा जी की बात बीच मे अधूरी रह गयी क्योकी उन्हे बुलाने उनके साहब का चपरासी आ गया ! जिस कमरे मे वह गए थे वह कप्यूटर रूम था जिस पर बहार लिखा था ,कृपया जूते बहार उतार कर प्रवेश करे !उसे पड़कर मुझे बुश का जूता प्रकरण याद आ गया और मे सभी राष्ट्र के अध्यक्षों तक जा पहुंचा जिन्होंने  उस चटपटे जायकेदार वयंजन की इच्छा की और वह पूरी हुयी ! अब तो हमारे यहाँ जम्मूकश्मीर और हरयाणा के लिए भी वही जायकेदार वयंजन आयात कराये जा चुके है !फिर ख़याल आया कि यह वयंजन अब पहले जैसे महत्व के नहीं  रहे ,! यदि मैंने शर्मा जी को जूता डिश चखायी, तो ये खुद को उस मुख्यमंत्री के कद का समझने लगेंगे और मेरे जूते का सम्मान घट  जायेगा !

इस खोकली ईमानदारी पर अपनी तो पूरी जिंदगी बर्बाद की ही और मेरे भी कर डाली !कही दो चार बच्चे होते तो आज हम सब भीख मांग रहे होते !मैं सोच ही रहा था कि इतने मे शर्मा जी आ गए और बोले कि रेट दस हज़ार का है निकालो और अपनी पेंशन ले लो अरे कम से कम अपनी बेटी के शादी तो ढंग से कर लो मास्टरजी !शर्मा जी ने साफ़ साफ़ कहाः और यह सुनकर मेरे सरे आक्रोश पर ताला  सा लग गया ! मैंने शर्मा जी से कहा मैं किसी का धर्म भ्रष्ट नहीं करना चाहता सच तो यह है कि मेरी बेटी की शादी तय हो चुकी है !यह पैसा जितनी जल्दी मिल जाता उतनी जल्दी मैं उसकी शादी कर डालता ! अब मैं बेचारगी पर उतर आया था ! पर शर्मा जी टस  से मस  न हुए और बोले मास्टरजी रूपए दस हज़ार दीजिये और अपना काम करवा लीजिये बिना उसके कुछ नहीं हो सकता ! दस हज़ार रूपए लेकर आ जाये और अपना चेक लेकर चले जाये शर्मा जी ने दो टूक लहजे मे कहा !मंजूर है मुझे मैंने कहा !

शर्मा जी फिर मुझे समझाते हुए बोले देखीये मास्टर जी जैसे बिटिया की शादी  मे खुशी खुशी दहेज़ दिया जाता है ,जैसे किसी देवता को खुश  करने के लिए प्रसाद चढ़ाया जाता है वैसे ही प्रजातंत्र के इस मंदिर मे प्रसाद चढ़ाते समय मन गन्दा नहीं करना चाहिए ! आपके द्वारा चढ़ाया गया प्रसाद बी एस ए से लेकर शिक्षा मंत्री ,मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक पहुंचता है !किन्तु यह बात मुर्ख जनता कहाँ समझती है वह तो इसे भ्रष्टाचार कहती है ,पूजा तोड़े ही मानती है इसे !भाई मास्टर जी अब आप इस भ्रष्टाचार को कुछ भी नाम दो पर  इसे भ्रष्टाचार मत कहो !मैंने शर्मा जी के हाथ पर दस हज़ार रूपए दिए और अपना काम करवाकर लौट आया !पर आज भी मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि इस भ्रष्टाचार को क्या नाम दूँ !यही है आज के राजतंत्र का जनतंत्र !

दिनेश सक्सेना

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

एहसास



लेख 

सतर्क रहिये और विचार कर अपनाइये




प्यार दुनियाँ का सबसे आकर्षक और सशक्त शब्द है । प्यार को ज़िंदगी से निकल दीजिये फिर सोचिये ,जिंदगी कैसी होगी ? मैने इस पर बहुत बार लिखने की सोची पर ये मुझे कभी समझ ही नहीं आया , क्यूँकि जब भी इसको समाज के बीच देखा, सुना, जाना, महसूस  किया तो थ्यौरी और प्रक्टिकल में अंतर ही पाया। कहने को तो प्यार इबादद है , ईश्वर का दिया उपहार है , पर असल में धोखा और फरेब क्यूँ है ? पर एक सत्य ये भी हैl कि अगर आप दुनियाँ और स्वार्थ से हट कर इसे महसूस  कीजिये, तो ये बहुत ही सुखद और अपनत्व लिए हुये है। पर वर्तमान का प्यार I love you वाला है ,और इस I love you कि मै क्या व्याख्या करूँ,इसकी विश्वसनीयता मेरी add की हुई पिक में देख लीजिये………… इतना ही लिख पाये थे ,तभी मेरी भतीजी ने आकर कहा, बुआ जी बुक दे दीजिये कोई भी, बाबा जी पढ़ने को माँग रहे है। और उसे बुक देते हुए, 'प्रेम प्रकाश जी' की बुक मेरे हाथ में आ गई, उसका जो पन्ना खुला उसके ऊपर ही लिखा था Remain alert and adopt after deliberation मैने थोड़ा पढ़ा, तो मैंने सोचा कि मेरे प्रेम की व्याख्या में आकर्षण ,भावुकता ईश्वरिये गुण सब हो सकते हैl पर वर्तमान के धरातल पर मेरे प्रेम ने मुझे तकलीफ ही दी, तो हम आपको वो नहीं दे सकते, जो तकलीफ दे और स्वप्निल दुनियाँ में ले जाएl क्यूँकि मैंने हमेशा आपको यथार्थ ही दिया है ,l और फिर हमने अपने प्रेम ग्रंथ को फिर अधूरा ही छोड़ दिया....और जो दे रहें है l वो हमे उमीद है , आप सबको पसंद आयेगा और वर्तमान में जीने में सहायक भी होगा........................

सतर्क रहिये और विचार कर अपनाइये
Remain alert and adopt after deliberation

इस दुनियाँ के प्रति प्रेम और अपनापन का व्यवहार जितना आवश्यक है ;
उतना ही आवश्यक इस संसार से सतर्क रहना भी है। यह वह रंगमंच है ,जहाँ प्रत्येक प्रकार के जानवर  और लोग  तरह-2 के स्वांग भर  कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। इसकी सारी गतिविधियाँ स्वार्थ के वशीभूत ही चलती रहती हैं। न जाने कितने पैगम्बर , कितने ईश दूत , कितने ही प्रभु अवतार यहाँ उत्पन्न हुए हैं ; मानवों को सभ्य बनाने के लिये इन लोगों ने अपने को तिल-तिल जलाकर करूणा, दया, प्रेम, स्नेह का महत्व स्थापित करने की कोशिश की है ; लेकिन वे इस विश्व में इन उदात्त भावों को प्रतिष्ठित कर सकने में असफल रहे। इस मनुष्य की मक्कारी देखिये कि वह इनके स्मारकों, प्रतीकों, मूर्तियों और बुतों का निर्माण करता है। उनके चरणों पर सिर पटकता है, गले में फूलों की माला डालता है, उनके नाम पर हमेशा मार काट मचायें रहता है ; पर अपने हृदय में उनके उदात्त भावों को प्रतिष्ठित नहीं करता। वह अश्रुभरे नेत्रों से इनके सामने हाथ जोड़े अपनी शरण में लेने की प्रार्थन करता रहता है; पर उनके हृदय में व्याप्त शैतान ठहाके लगता रहता है। फर्क केवल इतना है कि इसने पाखण्ड का चोला पहन लिया है; जो और भी खतरनाक है ; क्योंकि सज्जन व्यक्ति इनके धोखे में पड़कर मारा जाता है।
अतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में , प्रत्येक व्यक्ति से सतर्क रहने की जरूरत है। प्रेम, दया, स्नेह, अपनापन, उदारता, करुणा, आदि अच्छे भाव हैं और निश्चय ही इन्हें आपको अपनाना चाहिये; पर यह लकड़बघ्घों और भेड़ियों के लिये नहीं है। ये किसी भी रूप में आपके सामने आ सकते हैं।
चाणक्य ने कहा है - "राह में चलते समय, घर में प्रवेश करते समय, समाज में व्यवहार करते समय, उठते-बैठते एवं भोजन करते समय और सोते समय ; जो सतर्क रहता है; वही बचता है; दूसरा नहीं।" "दार्शनिक प्रेम प्रकाश शर्मा"

मेरी इस पोस्ट का उद्देश्य आपको जागरूग करना है ,खुद के प्रति और दुनियाँ के प्रति भी, तो प्लीज रेनू की रिक्वेस्ट है.. कि सतर्क बनिएगा सनकी नहीं ,की आप आज को जी ही न पाओ l तो एन्जॉय कीजिये अपनी लाइफ को केअरफुली खुश रहिये, सबको खुशियाँ बांटिये हम फिर मिलेंगे..कुछ दिनों बाद....…………… 

.रेनू सिंह  







मंथन



यादें

तन्हाइयों का बिरानियों का अंदाज़ क्या बतायें
हम आज अपने दिल का हाल क्या बतायें
लग रहा है फिर से पास वो आएगें
पर जाने वाले का इंतज़ार क्या बतायें
तन्हाइयों का.............................

लोग बदल जाते है जगह वही रहती है
अंदाज़ बदल जाते है बात वही रहती है
हर लम्हों की याद बनी रहती है
दी हुई उनकी सौगात क्या बताये
तन्हाइयों का..........................
क्यूँ भीड़ मे भी तन्हा हम आज लग रहें है
हम उनसे अपने रिश्तों का नाम क्या बतायें
तन्हाइयों का...........................
उनका मुस्कुराना यूँ पास मेरे आना 
मुझसे सब बताना आज उन पलों की क्या दास्ताँ सुनाये
तन्हाइयों का...................................
हम आज...................................
....रेनू सिंह

मंथन

कविता

विस्तार तुम्हारा 


विस्तार कहाँ तक "तुम " को दूँ
प्रथम "तू "अपने को इंगित करता

ओर अंत "म"मुझको कहता है
"तू" तू ही रहेगा "म "मै ही हूँ

फर्क इतना ही है की पहले "तू"
और पीछे मै हूँ जोड़े की तरह

हम दोनों को, एक ही जोड़े है
उसको कुछ भी नाम दे दो तुम

कुछ भी समझ लो नया  तुम
प्यार ,प्रेम ,मोहब्बत संज्ञा दे दो

सब कुछ देखो और परखो खरा तुम
कसोटी पर कसो और देखो फिर तुम

एक नया रिश्ता ,एक नया बंधन
"तू"और "म " मिला" तुम" बनजा 

दिनेश सक्सेना